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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1650

( ४० )

बोधसागर

पांच पांच सकल पसारा । पांच रंग श्वासा अनुसारा ॥
तीनि तत्त्व अस्थूल निवासा । तीनि मध्य दुई बाहर वासा ॥
पांच तत्त्व सब इनके पास । जहाँलिंगआपलखनि परकासा ॥
पांच तत्त्व तीन गुण साजा । नारि एक तामध्य विराजा ॥
अचल खानिमह कीन्हे वासा । तामध्ये श्वासा रहि वासा ॥
चन्द्र सूर्य बिन श्वासाहीनी । ताते खानि जड भई मसीनी ॥
अचल खानि ताते जड होई । सूर्य चन्द्र नहि मध्य समोई ॥
नारी एक श्वासा संग ताहां । जहाँलै अचलखानिजगमाहां ॥
नारिसुषुमण अचल घटबासा । ताहि संग श्वासा रहि वासा ॥
ता घट दोई नारी नहीं होई । ताते चन्द्र सूर्य नहि दोई ॥
इंगला पिंगला नाहिन बासा । ताते रवि शशि नाहि निवासा ॥
चन्द्र सूर्य घटके रखवारा । एहि डोले एहि बोलन हारा ॥
चन्द्र सूर्य बिन जागे नाहीं । ताते अचल खानि जगमाहीं ॥
दुई दिन कोई मास गलिजाई । कोई छ मास कोई वर्ष रहाई ॥
कोई दश वर्ष माह जग राते । कोई तीस चालिस तन बासे ॥
कोइ पचास साठि रहि वासा । कोइ सत्तरी कोई असी नेवासा ॥
वर्ष इकावन कोई तन राखा । कोइ सौ हजार कोइ लाखा ॥
कोइ कोटि कोइ अरब निवासा । कोइ पेड चारों युग बासा ॥
इहिविधि अचलखानिकरभावा । औषधि व्याधिरोग उपजावा ॥
एक सजीवन जड़ी अनूपा । एक जडी विश्व तेज सरूपा ॥

समय-कोई शीतल कोइ तेज है, कोइ पारसकी खानि ।

फूल विना फल ऊपजै, सब फलफूल समानि ॥

चौपाई

इहिविधि अचलखानिउपजावा । तेहि पाछे अंडज निरमावा ॥

अंडज खानि सजीवक कीन्हा । चन्द्र सूर्य सङ्ग जीवन दीन्हा ॥