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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1647

शवासुआर

( ३७ )

उत्पत्तिकी गति सब हम पाईं । परलैकी गति कहौ बुझाईं ॥
रक्षक भक्षक एकहि सङ्ग । कहौ विचारि दोऊको अङ्ग ॥
जब साहब शिवशक्ति बनाईं । सो तो गम्य सबै हम पाईं ॥
सो शिवशक्तिकालरचिराखा । दोनों अङ्गधरि प्रकटी भाखा ॥
कामरूप विष वाण बनाया । कला अनन्तधरि प्रकटी काया ॥
घर घर शिवशक्तीसुत नारी । विरह वियोगसोगसुख भारी ॥
नाना रूप रंग उपराजा । उपजनविनसनसुखदुखसाजा ॥
कुल व्यवहार सकुचऔं लाजा । नात गौत रस लीला साजा ॥
चारि खानि बानिधरि गाजा । चारि बर्ण औ शर्म उपराजा ॥
लाज वरन कूरी कुल काजू । योग्य यज्ञ व्रत दान समाजू ॥
संपत्ति बिपत्ति रंक औ राजा । अन्न वस्त्र माया उपराजा ॥
सब ऊपर मन आप विराजा । मनबसि होय सैर सब काजा ॥
मन इन्द्री मई भोग संयोगा । मनै स्वाद औ स्वाद वियोगा ॥
मनहरता मन करता सोगा । मने रोग औ दुखसुख भोगा ॥
मनते कोई और न दूजा । मनसाहब मन सेवक पूजा ॥
मन देवल मन प्रतिमा साजा । मनपूजा मन तीर्थ विराजा ॥
मन शिवभक्ती विरह अपारा । रुधिरबिन्दु मनसिरजनहारा ॥
मनै जियावन मरने हारा । मनहिअशुभशुभ कर्मव्योहारा ॥
कर्मा कर्म मनहिते होई । भोग करै भुगतावै सोई ॥
मन भर्मित मन चेतन हारा । चारि खानि मनखेल पसारा ॥
मनशीतल मन तेज अपारा । मनश्वासा मन बोलनि हारा ॥
समय-चन्द्र सूर्य संग मन वसे, शुभ अशुभ मन आहि ।
श्वासा श्वासा मन बसे, कहि बरण गुण ताहि ॥

चौपाई

खानि खानिमनहोयअसवारा । फैलि रहा मन अगम अपारा ॥