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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1627

शवासग्रन्थ

( १७ )

भूलयो धरम चितहि अकुलाना । ऐसो सरवर मैं नहि जाना ॥
अक्षयअयूनविधि पारसयामा । कहा अचम्भो आनितुलाना ॥
देखो तेहि पारसको चीन्हौं । जेहिते मानसरोवर कीन्हौं ॥
शूर मलीन उदय शशि जोना । बानी बरन अंग तुअलोना ॥
जादिन पुरुष रचा तुअदेहा । तादिन मोहिं तोहिं जुरासनेहा ॥
मोहिं कारण तोहिं पुरुष बनावा । तू कुलमोते अंग छिपावा ॥
तोहि कारण मैं रचना कीन्हौं । रचिकेखानितोहि चित दीन्हौं ॥
" " " मोहि कारण तोहिं रचना कीन्हौं ॥
देहनात हमरे घर नाहीं । हम तुम रहे एक घर माहीं ॥
उत्पति पारस तुमरे पास । जाते पूजे मनकी आसा ॥
देह सबै हम रचा बनाई । पारस दै तुम लेहु जियाई ॥
हम तुम खानि रची बहु बानी । जाते होय ना एकौ हानी ॥
जैसी रचना पुरुष प्रकाशा । तैसी रची लोक रहिवासा ॥
जीव सीव रचि खानि बनाई । जाते ज्योति ज्ञान फैलाई ॥
( जीव रची सब खानि बनाई । जागे ज्योति ज्ञान फैलाई ) ॥
लाज सकुचि औ रची सगाई । बरण बिचारि छूत बिगराई ॥
ठांव ठांव रचि राखी आपा । माता पिता शोक संतापा ॥
भशुर भसुर औ भर्मित भाई । शिवशक्ती रचि पूजा लगाई ॥
" " " हंसन लाज भाव नात वैधाई ॥
रची अचार कपट विस्तारा । तीरथ व्रत प्रतिमा देवहारा ॥
" " " तीरथ व्रत औ नेम अचारा ॥
वेद कितेब धरि फंद सँवारी । रची दीनों वोय पर्वत भाँरी ॥
हुओ दीन हुए राह चलाई । झगर करै रहै अरुझाई ॥
एक एकते रारि बढ़ाई । मुक्तिपंथते रहै भुलाई ॥
दोउ दिन बाँधी मरजादा । रची बाद ममता औ स्वादा ॥