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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1623

श्वासगुआर

( १३ )

तत्त्व रंग बहु लीला धारी । पुत्री बहुत विचित्र संवारी ॥
तासु कला अनंत पसारी । ताते बहुत भई विस्तारी ॥
वरणि न जाय रूप उजियारी । सुन धर्मनि मैं कहौं विचारी ॥
काल अनंत प्रभु पुत्री कीन्हा । पारस सार ताहि मैं दीन्हा ॥
उत्पति पारस पुत्री पावा । प्रकटी कला अनंत सुभावा ॥
नखशिख देहसुधा प्रभु कीन्हा । पैचई श्वासा भीतर दीन्हा ॥
जब थासा काया मैंह आई । प्रकटी ज्योति जगामग झाई ॥
अजब अङ्ग बना बहु रंगा । पारस सार ताहि के संग ॥
निर्मल उदित ताहि सो दंता । चमकै बिछुली कला अनंता ॥
तत्त्व रंगकी उठै तरंगा । शोभा विशद मनोहर संग ॥
पैचई श्वास जब बाहर कीन्हा । उत्पन पारस ता संग दीन्हा ॥
श्वासा परस मिलि भये एका । शोभा वरन रूप रस ठेका ॥
उपजी कन्या कला अपारा । रूप अनूप भया उजियारा ॥
जब कन्याप्रभु उत्पन कीन्हा । पाँचो श्वासा तासङ्ग दीन्हा ॥
ता श्वासामह पारस भारी । पांचतत्त्व सङ्ग देह सँवारी ॥
उपजी कन्या अगम स्वभावा । अष्टांगी कहि पुरुष बुलावा ॥
आठों अङ्ग बना निरवाना । शोभा सुरति रूप सुख साना ॥
जब कन्या प्रभु देखा हेरी । कला अनंत रूपकी ढेरी ॥
देखि रूप चितहर्षित कीन्हा । उत्पति पारस ता संग दीन्हा ॥
जाने शब्द मूल रहि वासा । सुरतिनिरतिकीन्हातहां पासा ॥
पुरुष रचा जब आपु शरीरा । उपजी सुरति निरति गंभीरा ॥
कायाके दलके व्यवहारा । जो चाही सो सबही सुधारा ॥
दहिने अंग तेज कर दाऊ । बाये शीतल सबै सुधाऊ ॥
मध्यम पुरुष सुरति अंकुरा । ताहि सुरति संग पारस पूरा ॥
ताही दिन तीनों गुण ठयऊ । इंगलापिंगला सुखमनकियऊ ॥