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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1620

( १० )

बोधसागर

तेज पूँज भौ गर्भ शरीरा । फूँकी नालदेखा बल वीरा ॥
कमल नाल धरि फूँका जबही । चौथी श्वासा निकसी तबही ॥
फूँका कमल तेजके नेहा । चला प्रसेव पुरुषकी देहा ॥
फूँकत कमल बार नहिँ लागा । भयउजियार तिमिर सब भागा ॥
कारण काल पट यहँ धोका । दुई चित मूल तेजमह रोका ॥
चौथी श्वासा विषयी सनेही । मोह विकार धर्मकी देही ॥
मोह विकार तिमिर अधिकारा । ता सँग भयउ धर्म औतारा ॥
तिसरी श्वासा गुप्तहि राखा । तासो जोर निरञ्जन भाखा ॥
फूँकत कमल तेज गरि गयऊ । तेहितेकाल ज्योति धरि भयऊ ॥
महा बलि देह धरिके बैठा । जानो धर्महीं हौ जेठा ॥
तेज लगन श्वासा अनुसारा । ताते धर्मराय बरियारा ॥
तेजतिमिर संग शून्य निवासा । सबतर भयो काल परकाशा ॥

समय-आसा धरे बहुत दिन बीते, प्रेम भक्ति लौलीन ।

आश धरे बहुतयुग गये, भक्तिभाव आधीन ॥

(ज्योति तहाँ लगिज्वालतेभाखा । तेहि ते नाम निरञ्जन राखा) ॥
निराकार आकार धराये । जोति काल बहुनाम कहाये ॥
चौदह द्वार काल जो भाखै । सुनि सो सबै नाम मन राखै ॥
सांकित अण्ड भयो प्रचंडा । फूटत अण्ड भयो बहु खण्डा ॥
चौदह बुन्द अमि ढरि गयऊ । चौदह अंश ताहिते भयऊ ॥
चौदह पौरिया ढरि बैठारा । इन चौदह बहु ज्ञानपसारा ॥
आपसमान सबै रचि राखे । चौदह कोटि ज्ञान तिन भाखे ॥
चौदह अंस धरम तहाँ पाये । ते चौदह विद्या तहाँ पाये ॥
वही चौदह अगम अपारा । तापर काल धरम बटपारा ॥
धरम समाधि चितही यमधारा । चौदह मोह को तनवारा ॥