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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1616

( ६ )

बोधसागर

चौपाई

( सोलह सुतकी उत्पत्ति प्रकार )

सुरति नेह प्रभु इच्छा कीन्हौ । सोरह सुत उपजावे लीन्हौ ॥
सत्यनाम श्वासा अनुमाना । सुकृत अंश भये अगुआना ॥
दूजी श्वासा बाहेर आई । उपजे सहैत शून्य तिन्ह पाई ॥
तिसरी श्वासा पुहुप सनेही । तेहिते भई हमांरी देही ॥
चौथी श्वासा तेज सनेहा । तेहिते भई धर्मकी देहा ॥
पांचह श्वासा नाम खुमारी । उपजी कन्यां आदि कुमारी ॥
शील नाम स्वासा निरमयऊ । छठयें अंश सुजनं जन भयऊ ॥
सतयें स्वासा नाम अनंगा । उपजे अंश भृगीसुंनि संगा ॥
अठयें स्वासा नाम सुहेली । उपजे कूर्म शीस उर मेली ॥
नवयें स्वासा नाम सोहंगी । नाम ते उपजे सुत संरवंगी ॥
दसयें स्वासा नाम रसीला । जाते उपजी संरवन लीला ॥
ग्यरहें श्वासा नाम सुरंगा । सुत स्वाभावें उपजे तेहि संगा ॥
ब रहें स्वासा नाम सुमाहां । भाव नाम सुत उपज ताहां ॥
तेरहें स्वासा अछय सुभाऊ । उपजे सुत विवेकें तेहि नाऊ ॥
चौदह स्वासा अमर बखाना । उपजे सुत संतोषें सुजाना ॥
पंद्रहे स्वासा प्रेम सनेहा । उपजी कदल ब्रह्मकी देहा ॥
❁ षोडशे स्वासा नाम जलरङ्गी । उपजी दंया पालन सङ्गी ॥
षोडश स्वासा षोडश बानी । उपजे भोग संतायन ज्ञानी ॥
सोलह स्वासा नाम बखाना । उपजे सोलह सुत निरवाना ॥
सोरह सुत कर एकै मूला । भिन्न भिन्न प्रगटी अस्थूला ॥
एके पिता एक व्यवहारा । सब जो रहिहैं पुरुष दरबारा ॥

  • कई एक प्रतियोंमें इस चौपाईको ऐसा लिखा है की, "सतरहें श्वासा अदत मुबानी" परन्तु षोडश, सुतकी उत्पत्ति वर्णन करते हुये सतरहवें की उत्पत्ति वर्णन असङ्गत जानकर यही शुद्ध जान पड़ा ।