कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1604, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १६ )
बोधसागर
सतगुरु वचन
कुदरत कमाल सुतअंश हमारा । तुमरे जिवका करो उबारा ॥
इलम फकीरी तुमको दीना । जीव उबार अपना करलीना ॥
सोई इलम मम राखू पासा । साखी पद तुम करहु प्रकाशा ॥
जो यह इलम बाहर जायी । तो हम तुम बिछुरेंगे भाई ॥
इलम यही धर्म दासको दीना । जाते हंस अमर करि लीना ॥
दोहा-बन्धे कौल कमालके, सतगुरु कहे पुकार ।
धरमदासके वंश विना, कौन उतारे पार ॥
आगे बानी भाँई भाई । दास कमाल सुनो चितलाई ॥
कलियुग भेद कहै परकाशा । हंस पहुँचाऊँ लोक निवासा ॥
विहँगम मति हंस जब होई । सत्य कही सत्यलोक समोई ॥
आगम भेद कही समुझाई । भौजल बूड़त तुरत बचाई ॥
वंश व्यालिस सौपी गुरुवाही । जो बूझे तेहि देउँ बताही ॥
सोई इलम सौपा उनपासा । सब जीवनकी पूरे आसा ॥
वंश दया जाहि पर होई । होय पुनि हंसा अम्बर सोई ॥
कह कबीर हम सतही भाखा । सुनो कमाल गोय नहिं राखा ॥
दोहा-कलमाते कल उपज्यो, सब कल कलमा माहिं ॥
सोकलमा दिया कमालको, सब कल कलमाहि समाहिं ॥
जीवत मृतक होय रहे, जाग्रत माहिं समय ।
इलम फकीरी अलम सही, आवे जाये बलाय ॥
समरथ सतगुरु भेटिया, भये मद मस्तु निहाल ।
प्रेम प्याला सही किया, सुक्ता खेले कमाल ॥
इति कमालबोध