कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1598, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १० )
बोधसागर
दोहा-याका मरम पाया नहीं, सतगुरु कहो समुझाय ।
एतिक ईटा मारसे, तुम कहें ना विकलाय ॥
एकै पखुरी फूलसे; लागी इतनी चोट ।
होय विकल धरनी गिरे, हो गये लोटम पोट ॥
कमाल वचन
बिना भेद उन ईटा डारा । तुमतो हमको चीन्हके मारा ॥
मोंसे इलम फकीरी पाई । ताते तुम मोकूं मारा भाई ॥
यह दुनिया है कालका चारा । इसपर चले न अमल हमारा ॥
ताते देह छांडिहमभये नियारे । डारे कोटिक ईट अपारे ॥
देखत तुमको देह समोये । शिष्य को दर्शनदेहमहँ होये ॥
भली कीन तुम मोको मारा । अपनी इलम फकीरी हारा ॥
बहुतेक ज्ञान हम तोहिं सुझावा । तौहु तुम मम मरम न पावा ॥
दोहा-इलम फकीरी चूकी तेरी, सुनहु खान पठान ।
दोजख जाहु मौजमें, यह सतगुरुका फरमान ॥
दरियाखान वचन
सब दुनिया खोजत कहँ जाई । सुझको कौने दोजख फरमाई ॥
कमाल वचन
भूत खानिमें रहो समाई । सब जग जाने तेरे ताई ॥
जानि बूझि तुम मोको मारा । सब भूतनका बनो सरदारा ॥
सब भूतनमें करो बादशाही । सबमें तेरी चले दुहाई ॥
एती खबर शाह सुन पावा । जिन्दांकहँशिरकाटनफरमावा ॥
कहे दरियाखान सुनो सुलताना । जिन्दानहींकोईऔलियाजाना ॥
यह सुनि शाह बहुत रिसाया । तुरतहि पोस्तें कादि मँगाया ॥
१-कमाल साहब उस समय जिन्दा वेधमें थे । जिन्दा वेधका हाल देखो ग्रन्थ जिन्दा बोध आगम ज्ञानमें : २-चमड़ा ।