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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1590

( २ )

बोधसागर

शाहसिकन्दर प्रतिज्ञा

दोहा—दीन दुनीका मैं धनी, मेरा जाय प्रान ।
मेरा बेदन जो हरे, मनवाँछित पावे दान ॥
ऐसा कोई औलिया नाही । मेरे तनकी तपन बुझाहीं ॥

वजीर वचन

कहै वजीर सुनो सुलताना । काशीमें एक फकीर सयाना ॥
वहां एक हिंदू फकीर रहाई । चौदहसौ वर्षजिनउमरधराई ॥
सब हिन्दू कदमों पै जाहीं । सब हिन्दूके पीर कहाहीं ॥
उनको चणारविन्द धरो तुम जाई । दर्शन करत जलन मिट जाई ॥
रामानन्द कहैं सुनी बड़ाई । शाह सवारी काशी आई ॥

दोहा—आय दुनीके बादशाह, सब संगहि दललाय ।

जलन मिटनके कारने, कदमों पहुँचे जाय ॥

चौपाई

भयो प्रभात जलन अधिकाया । जब रामानंद कहै दर्शन धाया ॥
शाह सिकन्दर दर्शन आये । सबही अमीर सङ्ग चलिधाये ॥
आये मण्डप आये सुलताना । रामानंद दिल रहै खिसियाना ॥
शाहको अग्नि उठी अधिकार्ई । भये विकल सही ना जाई ॥
त्राहि त्राहि तब कीन पुकारा । रामानन्द तब मुखफेरि सिधारा ॥
देखि दशा भई अति क्रोधा । कहै वजीर सुनो सब योधा ॥
देखो इस काफिरकी गुमराही । चढ़त क्रोध मोंहि रह्योनजाही ॥
दीन दुनीके शाह सुलताना । जिनको नमै सकल जहाना ॥
सो काफिरके कदमो आवे । देखत तेहि काफिरसुँह फिरावे ॥
ऐसो काल चढ़यो बलवंडा । नफरके घटमें भयो परचण्डा ॥
ऐसो तेग चलायो जायी । काटयो शिरधड दूर गिरायी ॥
ताह अवसर अचरजअस भयञ्ज । देखत दुनी अचम्भो ठयञ्ज ॥