सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1563, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1563

धर्मबोध

( १८७ )

तजि चंचलता भावको, अनहिंसा रह नित ।
दृढ समाधिआसनअचल, छितसौ क्षमाहै चित्त ॥
घेरे विपत्ति अनेक जो, आसन तजे न संत ।
दुःख द्रन्द लखि भाग मति, दृढ संकल्प गहंत ॥
शुद्ध अचार विचार मय, नहिं मनमें मदमान ।
धीरज धर्म संतोष गहि, लघु भोजन परमान ॥
राग द्वेष नहिं शत्रु हित, तजे दर्प हंकार ।
शीतउष्ण समदुःख सुख, प्रिय अप्रिय यकसार ॥
मान और अपमान सम, तजे जक्त की आस ।
चाह रहित संशय रहित, हर्ष शोक नहिं तास ॥
अधो दृष्टि मारग चले, चार हाथ महि देख ।
जाग्रत मौन मधुर बचन, मन संकल्प न लेख ॥
पात्र कुपात्र विचार गृह, भिक्षा दान जो लेत ।
नीच अकर्म सूम घर, दान महा दुख देख ॥
सदा होय मलपात जिहि, देहि में जो नौ द्वार ।
मुखी ठौर एकन्त लखि, ताको दीजै डार ॥
देह को विग्रह नाम है, रोग दुःख बहु घेर ।
धीरज धरे मनमें सदा, दुख करि काहु न टेर ॥
अपने मन कोई करे, भावे करे न सेव ।
काहूसे नहिं जांच कछु, यही संतको टेव ॥
लाभालाभ जयाजयौ, गंध कुगंध समान ।
रूप कुरूपहिं समलखे, गुरु हरिको गुनगान ॥
संध्या तीनों काल दृढ़, कर्म किया विधिलेख ।
दम्भ छिद्र छल रचे नहिं, प्रभु अनन्य जो देख ॥

१ छितसौ - पूर्वोके समान क्षमापान ।