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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1557

धर्मबोध

(१८१)

गृहकारजमें पाप बहु, नित लागे सुनु लोय ।
ताहित दान अवश्य है, दूर ताहिते होय ॥
चक्की चौका चूल्ह महँ, झाडू अरु जलथान ।
गृह आश्रमीको नित्य यह, पाप पंचविधि जान ॥
और युगनमहँ गृही कर, योग यज्ञ मख जाप ।
कलिमें सो कछु होय नहिं, कटे दानते पाप ॥
यथायोग जग लोग सब, बिन सम कीजे दान ।
कह राजा कह रंक है, दोनों एक समान ॥
जो धन पाय न धर्मरत, नहीं दान व्यवहार ।
सो शिर पावँको भारभरि, बंधे यमपुर द्वार ॥
गुरुजन जो परिवारके, कर आदर सतकार ।
लघु गुरुलोग जो योग जस, कुलको पालनहार ॥
पुत्र पौत्र बनितादि जे, इतर जेते लघु देख ।
भलो सिखावन दीजिये, जाते भला बिसेख ॥
जो गुरुजन परिवारके, लघुको सीख न देत ।
जो कछु औगुन सो करे, अघ शिर अपने लेत ॥
सोई मित्र सोई सगा, भल शिख शिशुहि दिखाव ।
तरुण अवस्था सुख लहै, गुरुजन सीख प्रभाव ॥
मारि ताड़िकै हठ किये, बाल अधर्मका राह ।
शुभगुण ज्ञानके पंथमें, बांधि चलाओ ताह ॥
मातु पिता सो शत्रु है, बाल पढ़ावै नाहिं ।
हंसनमें बकला यथा, तथा सो पण्डितमाहिं ॥
पहिले अपने धर्मको, भली भांति सिखलाय ।
अन्य धर्मकी सीख मुनि, भटकि बालबुधि जाय ॥
अपनो धर्म न जानेऊ, सीख्यो न्यारो धर्म ।