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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1554

( १७८ )

बोधसागर

कोटिन कंटक घेरि ज्यों, नित्य क्रिया निज कीन ।
सुमिरन भजन एकांतमें, मन चंचल गहि लीन ॥
साधू गुरु सेवा करे, श्रद्धा प्रेम सहीत ।
देव परम प्रभु ध्यावई, करि अतिशय मन प्रीत ॥
तन मन साधु जो सेवई, जपे निरंतर नाम ।
गृही सो पावै परमपद, योग समाधि न काम ॥
पुरुष यती सो जानिये, निज तिय तीय विचार ।
मात बहिन पुत्री सकल, औरी जो जग नार ॥
तिय ऐसो व्रत धर्मधर, निज पति सेवत जोय ।
इतर पुरुष जे जगतमें पिता भ्रात सुत होय ॥
पतिकी आज्ञामें रहै, निज तन मनते लाग ।
पिय विपरीत न कछु करे, ता तियको बड़ भाग ॥
मनकामना विहायके, हर्षसहित कर दान ।
सो तन मन निर्मल भया, होय पापकी हान ॥
यज्ञ दान बिन गुरु करे, निशि दिन माला फेर ।
निष्फल है करनी सकल, सतगुरु भाषे टेर ॥
प्रथमै गुरुसे पूछिये, कीजै काज बहोर ।
सो सुखदायक होत है, मेटे जिवका खोर ॥
अभ्यागत आगम निरखि, आदर मान समेत ।
भोजन छाजन बित यथा, सदा काल जो देत ॥
सोई म्लेच्छ सम जानिये, गृही जो दान विहीन ।
यहि कारण नित दान कर, जो नर चतुर प्रवीन ॥
पात्र कुपात्र विचारिके, तब दीजै तेहि दान ।
देता लेता सुख लहै, अन्त होय नहिं हान ॥
भूखा साधु भिखारि कोइ, नहिं आवे जब द्वार ।