कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअनुरागसागर
( २७ )
सिन्धुमथन और चौदह रत्न उपसिकी कथा
त्रय बालक जब भये सयाने । पठये जननी सिंधु मथाने ॥
बालक माते खेले खिलारी । सिंधुमथनहिं गयउ खरारी ॥
तेहि अंतर इक भयौ तमासा । सो चरित्र बूझो धर्मदासा ॥
धान्यो योग निरंजन राई । पवन आरंभ कीन्ह बहुताई ॥
त्यागो पवन रहित पुनि जबही । निकसेउ वेदस्वास सँग तवही ॥
स्वास सँग आयउ सो वेदा । बिरला जन कोई जानेभेदा ॥
अस्तुति कीन्ह वेद पुनि ताहां । आज्ञाका मोहि निर्गुनाहां ॥
कह्यौ जाव करू सिंधुनिवासा । जेहि भेटे जैहौ तिहिपासा ॥
उठी आवाज रूप नहिं देखा । जोति अगम दिखलावतभेखा ॥
जलेउ वेद पुनि तेज अपाने । तेज अन्न पुनि विष संधाने ॥
चले वेद तहैंवा कहैं जाई । जहैंवा सिंधु रचा धर्मराई ॥
पहुँचे वेद तब सिंधु मैझारा । धर्मराय तब युक्ति विचारा ॥
गुप्त ध्यान देविहि समुझावा । सिंधुमथनकहैंकसबिलमावा ॥
पठवहु बेगि सिंधुत्रय बारा । दृढ़कै शोचहु वचन हमारा ॥
बहुरिआपपुनि सिंधु समाना । देवी कीन्ह मथन अनुमाना ॥
तिहुँबालक कहैंकह समुझायी । आशिष दे पुनि तहां पठायी ॥
पैहौ वस्तु सिन्धुके पाहीं । जाहु वेगि तीनों सुत ताहीं ॥
चलिभौ ब्रह्मा मान सिखाई । दोउ लहुरा पुनि पाछे जाई ॥
छन्द
त्रय सुत बाल खेलेत चले, ज्योंसुभगबालमरालहो ॥
एकगहिछोड़तमहीपुनि, एककरगहिचलतलटपटचालहो ॥
क्षणहिधावतक्षणस्थिर खड़े, क्षणभुजहिगरलावही ॥
तेहि समयकी शोभा भली, नहि वेद ताकहैं गावही ॥