सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1542, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1542

( १६६ )

बोधसागर

सत्य शब्दको टेका दीना । ऐसे विधि पुहमी रचि लीना ॥
सागर सात तहाँ बिस्तारा । चलि हंसा जहाँ करे बिहारा ॥
पुहुपद्गीप है मध्य सिंहासन । कलाद्गीप हंसनको आसन ॥
सारखी-अबिगति भूषन अंगमें, अबिगति करे शृंगार ।
अबिगति बस्तर छाजई, अबिगति करे अहार ॥

इति

अथ प्रलय वर्णन--चौपाई

तीन प्रकारकी सृष्टि बखानो । प्रथमे ब्रह्म सृष्टि कहि गानो ॥
द्वितिये जीवकि सृष्टि कहायौ । तृतिये माया सृष्टि बतायौ ॥
ब्रह्म सृष्टि आचिन्त प्रमाना । जीव सृष्टि अक्षरते जाना ॥
माया सृष्टि निरञ्जन करता । सिरजै पोषै पुनि संहरता ॥
माया सृष्टि जाय बिनसाई । जीव ब्रह्म नहि प्रलैमें आई ॥
रचना सेखि निरंजन लेता । गूमट शीस माहि धरि देता ॥
शिरमें गूमट अजब कहाई । सकल सृष्टि तेहिमाहँ समाई ॥
प्रलयको घौस आव जेहिबारा । जत्त समस्त होय संहारा ॥
पुनि जलते पूरे संसारा । उठै चहुँ दिसि लहरि अपारा ॥
जलकी ऐसी बृद्धि बताई । अति उतंग पानी चढि जाई ॥
पृथ्वीते ऊपर जल सोई । दश योजन लों ऊँचा होई ॥
अन्तकाल कलियुग जब आवै । चीन्ह भयापन बहुत देखावै ॥
सवासौ वर्ष ग्रहन निरधारा । चंद ग्रहण सत वर्ष बिचारा ॥
ताहि ग्रनते लेखा लीजै । कलियुग लोक प्रवाना दीजै ॥

नानक बचन

परलय की विधि कहो दयाला । अलख ज्योति वर्षे केहि रूयाला ॥
काल बली तुमको नहि माना । प्रलयकाल तेहि कहा ठिकाना ॥

जिवा बचन

मुन नानक यह भेद अपारा । काल प्रलय जब करे संहारा ॥