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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1532

( १५६ )

बोधसागर

अथ सत्य कबीरके इतरपंथ वर्णन चौपाई

प्रथमें नानक पन्थ बखानो । पानप बहुरि पंथ कहि गानो ॥
दास मलोक पन्थ परचारा । बहुरि गरीबदास विस्तारा ॥
इत उत देशन देशन माहीं । सत्यकबीर पन्थ जहँ ताहीं ॥
जहँतहँ देखो सत्य कबीरा । हिंदू मुसलमान गुरु पीरा ॥
निज इच्छाते सो तन धारे । कालजालते जीव उबारे ॥
कबहुँ योनि संकट नहि आवै । जीव दया करि सतगुरु ध्यावै ॥
जिन जिन सतगुरुको पहिचाना । सो अवश्य लह पद निर्बाना ॥

शब्द

हम बसैं चामके धाम हमें कोई क्या जाने ॥
पशुपंछी नरनाग जहां लगि सबै चामको साज ।
चामै चामको दाम बटोरै चामरंगको राज ॥
चामै मांडै चामै पोवै चामै करै रसोई ।
चामै चामको परसि जिवावै चाम करे सो होई ॥
चामै गावै चाम बजावै चाम करावै नाच ।
चामै चामको भाव बतावै चाम बीच है सांच ॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो हम हैं पूरे चमार ।
जो कोई हमको पहिचानै उतरे भवनधि पार ॥

सो गुरु खोज सो सन्त सुजाना ॥

जो गुरु खोजि अमरघर आवै पावै मूल ठेकाना ।
जिन गुरु गुरु पञ्च निरमाये रच्यौ जमीं असमाना ॥
तिनके कर्म कटे भवबंधन जिन ओहिगुरुको जाना ।
टीका मूल बिनपरगट कीनो चौदह कोटि जो ज्ञाना ॥
नहीं बोल भाषामें आवै शब्दसैन सो जाना ।
आशा बन्धते परगट कीनो जो जैसे अनुमाना ॥