कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वसमवेदबोध
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पुनि निज नाम बखानिये, साहेबदास गुणग्राम ॥
उद्दैदास करु नाम पुनि, दृगमनि महामनि हंस ।
मुक्तामनि धर्मदासके, बिदित बयालिस वंस ॥
अथ बयालिस वंशकी स्थिति वर्णन—चौपाई
वंशबयालिसकी थिति भाखों । सत्य कबीर प्रमान जो राखों ॥
बीस द्यौस अरु वर्ष पचीसा । सिंहासन थिति येती दीसा ॥
वर्ष पचीस बीस दिन केरी । भोग पूर्ण थित हो जिहि बेरी ॥
गद्दी सौंपे जो अधिकारी । निज इच्छा पर धाम पधारी ॥
जबलों थित करार नहि पूजै । तबलों राजसिंहासन भूजै ॥
तिनको कबहुँ न मृत्युकी पीरा । अमर कीन तेहि सत्यकबीरा ॥
गद्दीको करार नियरावै । सन्त महंत खबरि तब पावै ॥
सुने सन्त पृथ्वी चहुँ खूटे । दर्शन हेत जाय तहँ जूटे ॥
लेहि चलानेको जब बीरा । जग प्रत्यक्ष निरखे तेहि तीरा ॥
यहि विधि आप लोकचलि जाई । सन्त महन्त बिदा तब पाई ॥
हंसन प्रति गद्दी थिति ऐसे । वंश बयालिस भै जे जैसे ॥
संवत पंद्रहसौ अरु बीसा । वंश थाप तेहि समयसे दीसा ॥
जब तेरही पीढी चलि आवै । मुक्तामनि तबही प्रकटावै ॥
धर्म कबीर होय परचारा । जहाँतहँ सतगुरु सुयस उजारा ॥
इति
अथ दुतिये गुरुभवसागरमें दक्षिण दिशा गोसाईं चतुर्भुजदासजी—चौपाई
लोकमें अकह अंश परकाशा । महिमें सोई चतुर्भुजदासा ॥
दक्षिणदिशि गुरु ताहि प्रसंशा । ताके हैं सत्ताइस वंशा ॥
यजुरवेद विधि पंथ चलाई । कुशहर द्रौप माहिं प्रकटाई ॥
नय करनाटक तेहि रजधानी । गह टकसार ज्ञानकी बानी ॥
इति