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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1511

स्वसमवेदबोध

( १३५ )

सुनि साधुन मन अचरज होई । यह तो सिद्ध पुरुष है कोई ॥
सब जोलहा मिलके एक बारा । नीरू ते अस बचन उचारा ॥
बालककी सुन्नत करवावो । तिहि कारन सब साज मँगावो ॥
ताहि काल अस कथा कहाई । नाई सुन्नतको बोलवाई ॥
तब नाई कबीर ढिग आया । ले अस्तुरा निकट नियराया ॥
पांच इंद्री ताको दिखलावो । काटि लेहु जो तोहि मनभावो ॥
यह लखि भभरिके नाई भागा । सुन्नत नहीं कीन डर लागा ॥
पुनि जोलहन अस कौतुककीना । तब बोलाय काजीको लीना ॥
एक गाय तिहि काल मँगाई । काजी ताको जबह कराई ॥
जिहि औसर अस कौतुक ठाना । सत्यकबीर मरम सब जाना ॥
खेलत रहे बालकन माहीं । तेहि छन धायके पहुँचे ताहीं ॥
गऊ घात जब देखत भैऊ । दया धारि काजीते कहेऊ ॥
बहुबिधि काजीको समुझाई । महापाप जिव घात बताई ॥
काजी लज्जित है शिर नायौ । बिनती करै न उत्तर आयौ ॥
तबहि कबीर गऊ ढिग जाई । मरी गाय तिहि काल जिवाई ॥
तब जोलहा गृह तजे कबीरा । अब नहिं रहौं तुमारे तीरा ॥
विकल भये तब नीमा नीरू । नग्र चहुँ दिश बालक हेरू ॥
दूँदत सुत न लहौ नर नारी । रुदन बिलाप करै दोउ भारी ॥
विकल विलोकि दया उर आई । तब कबीर तेहि दियो देखाई ॥
नीरू नीमा बिनती करही । प्रभु हमरे गृह पुनि पग धरही ॥
तब हम तिनते बचन उचारी । ऐसो पाप कीन तुम भारी ॥
तब जोलहा बोलै शिर नाई । नहिं यह पाप मेरी समताई ॥
मिल जोलहन कीनी बरियाई । ताकी खबर न मैं कहु पाई ॥
तापर कृपा बढुरिकै कीना । पुनि ताके गृहमें पग दीना ॥
बाल चरित्र है विविधि विधाना । सो संकेत न होय बखाना ॥