कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वसमवेदबोध
( १२९ )
अब कहँ साधु पाइये नाथा । तब तिनते बोले यदुनाथा ॥
श्वपच सुदर्शनको ले आवो । आदर मान समेत जँवावो ॥
सोई साधु और नहिं कोई । पूरन यज्ञ जाहिते होई ॥
कृष्णकी जब अस आज्ञा पाई । तब पांडौ ताके ढिग जाई ॥
श्वपच सुदर्शनको ले आई । विनय प्रीतिसे ताहि जँवाई ॥
भूप भौन भोजन कर जबही । बजा अकाशमें घंटा तबही ॥
काल कलुक जब गयौ सिराई । तब देहांत श्वपचको आई ॥
तन तजके तब सो चलि जाई । सतगुरु तिहि निजलोक पठाई ॥
ताही समय कृष्ण तज देही । बोधरूप धारचो तब येही ॥
नाम जो इन्द्रदौन तेहि काला । देश उड़ैसेको महिपाला ॥
तन तजि कृष्ण तहां चलि जाई । इन्द्रदौन कहँ स्वप्न देखाई ॥
स्वप्नमें अस हरि ताहि बताई । मेरो मंदिर देहु उठाई ॥
भूपतिसे जब ऐसे कहेऊ । सो मंदिरकी रचना गहेऊ ॥
रामचंद्र गहि निज दल भीरा । गये जबहि वारिधिके तीरा ॥
बांध्यौ सेत बंध बरियाई । तेहि कारन सागर दुख पाई ॥
जो बलवान अबल दुख देई । बदला अवशि भरैंगे तेई ॥
नीति निरंजनकी यह जाना । स्वसमवेदमें प्रथम बखाना ॥
बदला पूर्व लेन तिहि बारा । छोभित सिन्धु उठा खरधारा ॥
जब रचि मंदिर लाग उठावा । क्रोधवंत सागर तब धावा ॥
छनमें धाय सकल सो बोरे । जगन्नाथको मंदिर तोरे ॥
हारा नृप करि जतन उपाई । हरि मंदिर तहाँ उठै न पाई ॥
सत्यकबीर बचन-चौपाई
मंदिरकी यह दशा बिचारी । बर पूरब मनमाहँ सँभारी ॥
तब हम चले उड़ैसे माहीं । इन्द्रदौन भूपतिके पाहीं ॥
मन्दिर षट परकार बनाई । उदधि नीर तेहि लीन बुडाई ॥
पीछे उदधि तीर हम जाई । जायके चौरा तहाँ बनाई ॥
बो० सा० ९/