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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1502

( १२६ )

बोधसागर

रामचन्द्र वन भये दुखारी । तबहिं मुनींद्र तहाँ पग धारी ॥
योग युक्ति रघुपतिहि दृढ़ाई । बहुविधि ताकहैं शांति धराई ॥
जब मुनींद्रजी दायो कीने । सेत बांधि लंका पग दीने ॥
मन संशय कीने हनुमाना । सतगुरु कृपा लह्यौ दृढ़ ज्ञाना ॥
गरुड़ जो परम प्रेमते ध्याये । परम हंसकी पदवी पाये ॥
यहि बिधि केते जीव चेतार्ई । तब मुनींद्र निज लोक सिधार्ई ।
पहुँचे हंस पुरुष दरबारा । दरस पाय दुख हंस विदारा ॥
कछुक दिवसजबयहिबिधि बीते । त्रेता गत द्वापर तब थीते ॥

इति त्रेतायुगवृत्तान्त

अथ द्वापर युगमें मुनींद्रजीको पृथ्वीमें आगमन कथा और करुणामय
स्वामी नामधारन और जवतजीव तारन--बोपाई

पुरुष अवाज भई तेहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥
परम पुरुष कह शीस नवाई । महि मंडल मुनींद्र चलि आई ॥
जो प्रभु आहि नाम अरु नामी । द्वापर कह करुणामय स्वामी ॥
प्रथमहि जब भूलोक सिधारे । गढ गिरनार तहाँ पग धारे ॥
चंद्रविजय नृप नाम बखानी । गढ गिरनार तासु रजधानी ॥
परम भक्ति मय ताकी रानी । इंद्रमती तेहि नाम बखानी ॥
साधुसे परम प्रीति सो धारे । नित साधुनकी बाट निहारे ॥
साधुको जहाँ कहुँ आवत हेरे । नित आपने ढिग सो टरे ॥
परम प्रीतिसे सेवा धारे । तन मन धन साधुनपर वारे ॥
तासु प्रीतिकी रीति बिचारी । करुणामय स्वामी पग धारी ॥
जात चले तेहि मारग माहीं । रानीको मंदिर रह जाहीं ॥
देखे रानी चढ़ी अटारी । साधु जानि हरषित भइ भारी ॥
त्वरित पठायौ तहाँ निज चेरी । बेगि साधुको आनहु टेरी ॥
वृषली चलि हमकहैं शिर नावा । रानीको संदेश सुनावा ॥