कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वसमवेदबोध
( ११९ )
कैलवचन
सुन ज्ञानी मोर वचन अलेखा । अपने मनमें करो बिवेका ॥
सत्तर युग हम सेवा कीना । पुरुष बकसि भवसागर दीना ॥
समरथ वचन दीन मोहि हारी । तीन लोक पायौ संसारी ॥
तबकी बात रहित भै भाई । अब कस उलटी अदल चलाई ॥
सबै अंश भुक्तै रजधानी । हमपर कोप भयौ तुम ज्ञानी ॥
अब जस निरणय हमै सुनावो । तस सीषा पन जानि चलाओ ॥
कूर्मवचन
तबै कूर्म बोले अस वानी । बिनती एक सुनो हो ज्ञानी ॥
जो तुम बिनती मानो मोरा । तौ हम तुमसे करे निहोरा ॥
तुमहू कैल वचन जौ मानो । तौ हम ज्ञानी निर्णय ठानो ॥
ज्ञानी सुनौ पुरुष कै अंशा । धर्मरायको मेटो संसा ॥
चौका पान कजाव तुमारा । लोक वेदको काल पसारा ॥
जो कोइ करे जोर बरियाई । तौ हम ताके संग न भाई ॥
कूर्म जबै अस बिनती ठानी । ज्ञानी कैल दोहू सुख मानी ॥
फिरके कैल झांझरी आनो । ज्ञानी कैलको वचन सुनावो ॥
ज्ञानी और कालपुरुषको वार्ता--चौपाई
बिना शीसके यमकी देही । काल पुरुषको चीन्ह है येही ॥
सत्य कबीरसे बिनय उचारी । सुनिये ज्ञानी अरज हमारी ॥
अपनी देह नाथ मोहि दीजै । ऐसी मोपर दाय़ा कीजै ॥
ताको वचन मानि हम लीना । अपनी देहको कैलको दीना ॥
शीश समेत और बिन माथा । दोनों देह निरंजन साथा ॥
जब चाहे तब शीस देखाई । निज इच्छा पुनि ताहि लोपाई ॥
जो साधू बैराट निरेखे । सो यह कौतुक नैनन दीखे ॥
रूप विराट शून्यमें निरखे । निजु आगूको लेखा परखे ॥
जब षट्मास मरन रहि जावै । काल कबीर कि देह छपावै ॥