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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1490

( ११४ )

बोधसागर

सगरे झगरे रगरे बगरे, पशुज्ञान गहे डगरे डगरे ॥
बकचाल सभी न मरालमती, बिन एक रतीबन एकरती ॥
जब गर्भमें अर्भक अर्ज करे, तिहि गाढते साहिब गाढि धरे ॥
इत औरहि ढालको ख्याल खिला, बुधि खप्त मरे यहि तप्त शिला ॥
वह औध अचेत सुखोपति सो, कह पाय पराग बनारसको ॥
निज धामते राम पथाम लिया, जगती भगती पद पाय पिया ॥
कित हो झलकी मनसा मलकी, अरु अंध अचेतकिभयटलकी ॥
दुगदानी कि वानि विहानि इतै, मकरंदके फंदको जीव जितै ॥
मृतभृंगन बिंग बिहार करे, क्रम रेख विशेष न देख परे ॥
नहिं कोधित अंध कि गंध मिले, जिव दंडक भंडक भीर हिले ॥
गुरुपीर कबीर उजागर है, भव बोहित सोहित सागर है ॥
जगबंदन भर्म निकंदन है, सरनी सतलोककि संदन है ॥
सतनाम सनेह सुधाम चढे, कलिमा कलिमा कलिमाह पढे ॥
गुणग्राम निकास कबीर कबी, जस गावत पावत कोटि छबी ॥
धुरधर्म धराधर धार कहो, भवतारक पंथ प्रचार कहो ॥
नर पामर घामर बुद्धि बिना, यमज्योति पतंगके ढंग बना ॥
जग व्याधि रु आध असाध करे, चरणाम्बुज चरण चारु हरे ॥
भवतारन हेत निकेत कृपा, पयगाम लियो सुखधाम नृपा ॥
सुरभूप स्वरूप अनूप छिपा, रवि सोम जो कोटि करो मदिपा ॥
गुरुगुप्त कियो धुरको बरनं, भव और भयावन तौ शरनं ॥
हमरे उरके पुर बास करो, निज दासनको अब दास करो ॥
बिन कंतकै भौ जलजंत घने, दुखद्वंद कफंद कफंद फने ॥
जगमाह कि बाह निबाह लहे, भ्रम भो डरभे डरभीर बहे ॥
दनुजात बलात निपात भये, रणधीर बहीर गहीर गये ॥
जिहि जानत जान सुधाम धरे, मुनिके मन मंदिरमें बिहरे ॥