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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 149

अनुरागसागर

( २१ )

सत्य पुरुषका आधाको मूलबीज देना

पुरुष वचन अधाप्रति

तबहीं पुरुष वचन परगासा । पुत्री जाहु धरमके पास । ॥
देहुँ वस्तु सो लेहु सम्हारी । रचहु धर्म मिलि उत्तपतिवारी ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

दीन्हो बीज जीव पुनि सोई । नाम सुहंग जीव कर होई ॥
जीव सोहंगम दूसर नाहीं । जीवसों अंश पुरुष को आहीं ॥
शक्ति पुनि तीन पुरुष उत्पाना । चेतनि उलंघनि अभया जाना ॥

छन्द

पुरुष सेवावश भये तब, अष्ट अंगहि दीन्ह हो ॥
मानसरोवर जाहु कहिया, देह धर्महि चीन्ह हो ॥
अष्टङ्गी कन्या हती जेहि, रूप शोभा अति बनी ॥
जाहुकन्या मानसरवर, करहु रचना अति घनी ॥
सोरठा-चौरासी लखजीव, मूलबीज तेहिसंग दे ॥

रचना रचहु सजीव, कन्या चलि सिरनायके ॥
यह सब दीन्हो आदि कुमारी । मानसरोवर चलिभई नारी ॥
ततछिन पुरुष सहज देरावा । धावत सहजपुरुष यहि आवा ॥

पुरुषवचन सहजप्रति

जाही सहज धरम यह कहेहु । दीन्ह वस्तु जस तुम चहेहु ॥
मूल बीज तुमपहँ पठवावा । करहु सृष्टिजस्तुवमनभावा ॥
मानसरोवर जाहि रहाहु । ताते होइ है सृष्टि उराहु ॥

पुनि सहजका निरंजनके दिग जाना

चले सहज तहवाँ तब आये । धर्म धीर जहँ ठाढ़ रहाये ॥
कहेउ सुवचन पुरुषको जबहीं । धर्मराय सिर नायो तबहीं ॥