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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1481

स्वसमवेदबोध

( १०५ )

मातु जो दया विष्णुपर कीने । पिता देखाय निकटही दीने ॥
माता पिता एक मिलि गेऊ । विष्णु देखिके हर्षित भैऊ ॥
माता पिता सुत एकै ठेऊ । विष्णुसमाधिज्योति मिलिगैऊ॥
तीनों मिलि जब एकै भयऊ । तिहि पीछे जग सिरजै लियऊ॥
तब माता अस बचन उचारा । रचो सृष्टि तुम तीनों बारा ॥
अंडज उत्पति कीनी साता । पिंडजको ब्रह्मा उत्पताता ॥
उखमज खानि विष्णु न्यौहारा । शिव थाबरको कीन पसार ॥
चौरासी लख जूनी कीना । आधा जल आधा थलदीना ॥
नौलख जलके जीव बखाना । चौदह लख पंछी परमाना ॥
कृमी कीट सत्ताइस लाख । तीस लक्ष अस्थावर भाषा ॥
चतुर लक्ष मानुष परमाना । मनुषदेह लह पद निर्वाना ॥
और योनि परचे नहीं पावै । तत्त्वहीन भव भटका खावै ॥
एक तत्त्व अस्थावर जाना । उखमज दोय तत्त्व परमाना ॥
अंडज तीन तत्त्वगुन जाना । पिंडज चार तत्त्व परमाना ॥
ताते होय ज्ञान अधिकारा । मानुष देह भक्ति अनुसारा ॥
अंडज खानि तीन तत्त्वव्यापा । वायू तेज तीसरो आपा ॥
थावर एक तत्त्व है पानी । उखमज वायु तेजते सानी ॥
पिंडज चार तत्त्वसे बरनी । पौनो पावक जल अरु धरनी ॥
पिंडज नरकी देह देह सँवारा । ताते पंच तत्त्व परमाना ॥
नर नारीमें तत्त्व समाना । ज्ञान विभेद ताहुमें जाना ॥
चारो खानि जीव भरमावा । तब मानुषकी देही पावा ॥
पांच तत्त्व मानुष विस्तारा । तीनों गुण तेहिमाहँ सँवारा ॥
देह धरे छोडे जस खानी । तैसो ज्ञान लहे सो प्रानी ॥
प्रथम कहो अंडजकी खानी । दारिद्री निद्रा अलसानी ॥
चोरी चुगली निंदा माया । घर बन झाड़ी आगिलगाया॥