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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1478

( १०२ )

बोधसागर

सोरठा-नीचहि ऊँच सताव, ओल मोहिते पाय हो ।
द्वापर युग जब आव, तोहि पाँच भरतार हो ॥

चौपाई

शाप ओल जब सुने भवानी । मनमें गुने कहे नहि बानी ॥
ओल प्रभाव आपते पाई । अब कह करो निरंजन राई ॥
तुमरी वशय परी हम आई । जस चाहो तस करो उपाई ॥
आई माता विष्णु दुलारा । सुनहु विष्णु यक बचन हमारा ॥
अब तुम बेगि पिता लगि जाई । बेगि पिताको परसहु पाई ॥
आज्ञा पाय विष्णु तब चाला । पिता दरश कहै गये पताला ॥
अछत पुष्प लीने कर माहीं । चले पताल पंथ गम नाहीं ॥
पहुँचे शेष नाग पहुँ जाई । विषके तेज विष्णु अलसाई ॥
भयौ श्याम विष तेज समावा । निरंकार अस बचन सुनावा ॥
अहो विष्णु माता पहुँ जाई । कहियो सत् बचन ससुझाई ॥
सतयुग त्रेता जैहै जबही । द्वापर होय चौथा पद तबही ॥
जब तुम है हो कृष्ण शरीरा । लेहु ओल सो कहो बलवीरा ॥
जो जीव देय पीत जेहि काहूँ । हम पुनि ओल दिलावैं ताहूँ ॥
नाथहु नाग कालिंदी जाई । अब तुम जाहु विलंब न लाई ॥
बिल्लु पहुंचे जननी पास । कीनो सत् बचन परकाशा ॥
भेत्यौ नाहि मोहि पद ताता । विषके ज्वाल श्यामभो गाता ॥
व्याकुल भयौ तबहि फिरि आई । पितादरश नाहीं हम पाई ॥
सुनिकै हरषी आदि कुमारी । लीन विष्णु कहै निकटदुलारी ॥
चूम्पौ बदन शीश दियो हाथा । सत्य वचन बोल्यौ सुतगाथा ॥
देहुँ पुत्र तोहि पिता भेटाई । तोरे मनको धोख छुड़ाई ॥
प्रथमहि ज्ञान दृष्टि तुम देखो । बचन मोर हृदयेमें पेखो ॥
मनस्वरूप करि ताकर जानो । मनते दूजा और न मानो ॥