कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1467, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वसमवेदबोध
( ९१ )
जाते ओहं पुरुष भे अंशा । ओहं सोहं भे द्वै अंशा ॥
ताको आज्ञा उत्पत्ति कीना । शब्द संधि उनहूको दीना ॥
मूल सुरति अरु पुरुष पुराना । रचना बाहर कीनो थाना ॥
ओहं सोहं अंडन रहेऊ । सकल सृष्टि के करता भयऊ ॥
प्रथम अँकु दुज इच्छा संगा । तीसर मूल चौथ सोहंगा ॥
ओहं सोहं कीन प्रमानी । आठ अंश भे तिनते उत्पानी ॥
आठ अंश भे एक निधाना । करता सृष्टि भये परमाना ॥
सात अंशके नाम बखानो । जिनते सकल सृष्टि बंधानो ॥
प्रथम मूल अंकूर गनीजै । इच्छा सहज साहंग भनीजै ॥
पुनि अर्वित फिर अक्षर भैऊ । बृद्धि हेत करता निरभैऊ ॥
सातो अंश जीव हितकारी । जिव कल्यान काज तन धारी ॥
यहिविधि रचना करि करतारा । पुनि अपने मनमाहिं विचारा ॥
बिना काल नहिं जीव डेराई । कोइ न भक्ति भजन मन लाई ॥
तिहि औसर प्रभु काल उपाया । जाकी डर सब जीव डेराया ॥
जप तपादि संयम जो करनी । काले के डरतें सो सब बरनी ॥
सात अंश जिव दाया करता । अष्टम काल भयो संहरता ॥
सोरठा-बृद्धि हेत भे सात, अष्टम नास्तिकि हेत है ।
स्वसमवेद विरूपात, तिनते सब रचना भई ॥
चौपाई
द्वीपन द्वीप अंश बैठारा । सातो जहैं तहैं कीन पसारा ॥
अक्षर कीन जहाँ निज थाना । तहैं समूहजल तत्त्व बखाना ॥
अक्षर सुरति पुरुषकी बानी । त्रिगुण तत्त्व घटमाहिं समानी ॥
तब अक्षर को निद्रा आई । सोरह चौकरी सोय सिराई ॥
अक्षर सुरति मोहमें आई । ताते दूसरे अंश उपाई ॥
अंडस्वरूपी जलमहैं दीना । यह अबिगति समरथने कीना ॥