कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वसमवेतबोध
( ८९ )
जेते दृष्टि भावते जाये । सो सब रूप उत्पन्न कहाये ॥
चौथे रसते जलचर भयऊ । वृक्षके फलते कीड़े कहेऊ ॥
पंचम गंधते उखमज होई । छठे वासना उत्पत्ति जोई ॥
ताते देव योनि प्रकटानी । भूतादिक ताहीते मानी ॥
सप्तम इच्छाते सिध योनी । सात बीज यह उत्पत्ति थूनी ॥
दोहा-नारी ताको फूल है, पुरुष फल बतलाय ।
बहुरि स्थितके बीजको, वर्णन करौं सभाय ॥
चौपाई
ह्रीं स्थिती बीज षष्ठोई । आलबाल तिहि माया होई ॥
मोहके जलते सींचा येही । सात शाख फुटि निकसीतेही ॥
अन्न अरु जल तृण पृथ्वी पत्ता । फल अरु फूल स्थिती गहत्ता ॥
अन्नते नर जलते है जलचर । तृणते तृणचर पात पत्रचर ॥
पुष्पते स्थित पुष्पचर आही । फलचर सदा फलनको खाही ॥
महि अरु मैलते जो उपजाया । महिअरु मैलसों भोग लगाया ॥
अब सप्तम परलयको बरनो । क्लीं है बीज ताहि संहरनो ॥
परलयको अंकुर सों धारा । सात साख तामें परचारा ॥
आलबालकी ना कठिनाई । क्रोध बारिते सो तृप्ताई ॥
सात लाख हैं ताके तीरा । पृथ्वी पानी अग्नि समीरा ॥
लात हाथ अरु दंत भनन्ता । नास करनको शस्त्र अनन्ता ॥
भय है फूल मृत्यु फल जाका । सत्य कबीर वचन परपाका ॥
इति
अथ उत्पत्ति कथाग्रंथ अमर मूल सत्य कबीर वचन-चौपाई
आदि पुरुष जब हतो अकेला । शब्द स्वरूपी पंथ दुहेला ॥
मनसा घटते भिन्न निकारी । उत्पत्ति भई ताहि यक नारी ॥
वह नारी सकलो जग जाया । भग भोगे सो पुरुष कहाया ॥