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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1463

स्वसम्बन्धवोध

( ८७ )

गोडन लगे नित प्रति वाही । बुद्धिके जलते सींचा ताही ॥
आलबाल हंकार बनाया । मन रूपी तहैं खाद डराया ॥
अंतःकरण भूमिका माही । नित नौ पल्लव फूटै ताही ॥
नाना क्रम उपाछा नाना । नाना योग अरु नाना ज्ञाना ॥
नाना उत्तपति स्थित है नाना । प्रलय अनंत न जाय बखाना ॥
एक एक प्रति नाना बानी । नाममात्र कहि तासु बखानी ॥
सात बीज गुरुवन मिलि बोये । प्रथम सुभेच्छा नाम कहाये ॥
पुनि सुविचार दूसरे कहिये । तनोमानसा तृतिये गहिये ॥
सत्त्वापति चौथे कहि दीजै । असंशक्ति पंचम गनि लीजै ॥
छठे पदार्थ अभावनी भाषा । तुरिया नाम सप्तमे राखा ॥
बोये सात बीज जब येही । अंकुरे निकसे फुटि तेही ॥
प्रथमै सो अब करों बखाना । जाते ज्ञानकेर बंधाना ॥
सोहं बीजको अंकुर ज्ञाना । आलबाल भक्तिमय साना ॥
सींचा ताहि प्रेमकी बारी । ताने नित नौ पल्लव धारी ॥

दोहा-शुभ इच्छादिक सात ये, तिनप्रति बानी भूर ।

पल्लव तिनते बहु फुटी, रही जक्त भर पूर ॥

ज्ञान परोक्ष है फूल तिहि, फल अपरोक्ष जो ज्ञान ।

दो बिधि ज्ञान प्रमानमें, जक्त जीव अरुज्ञान ॥

चौपाई

दुतिये अकार कर्म कहि गावो । ताते क्रम अंकूर उगावो ॥
भय करि आलबाल कर ताही । लोभके जलते सींचा वाही ॥
तामें सात साष कर थापन । यजन याजन अध्यन अध्यापन ॥
दान प्रतिग्रह मैथुन गानी । सातो क्रमकी नाना बानी ॥
बानीते पल्लव बहुतेरो । फूल बासना ताको हेरो ॥
पुण्य पाप द्वै फूल सो आना । कर्म करै यह कीन बखाना ॥