कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वसमवेदबोध
( ७९ )
अथ स्वसमवेद धर्मवर्णन
दोहा—देव कबीर महंत गुरु, स्वसमवेद मत भाष ।
सार शब्द टकसार जहाँ, सत्यनामकी साष ॥
सार शब्द यक मूल है, टीका चौदह कोर ।
कोटिन ग्रंथको गनि सके, लहे न ताको ओर ॥
जे ती जगमें बनपती, अस गंगाको रैन ।
अगम अपार अकथ कथा, सत्य कबीरको बैन ॥
इति
अथ उत्पत्तिकथा—चौपाई
उत्पत्ति प्रलयकि कथा अनंता । बहु विधि सत्य कबीर भनंता ॥
उत्पत्ति प्रलय कोटिन बारा । स्वसमवेद निर्णय निरधारा ॥
कछुक लिखो सो ग्रंथन हेरी । कथा अनूप यथा मति मेरी ॥
प्रथमै आदिमें ऐसो कहेऊ । स्वतह स्वच्छंद जीव यक रहेऊ ॥
रह स्वतंत्र आनंद अकेला । नहिं तब गुरु नहीं तब चेला ॥
पक्की तत्त्वको ताकी अंगा । अंग पिंड दोनों यक ढंगा ॥
माया पुरुषसो जीव उपाना । सत्यस्वरूपी ताको बाना ॥
अपना रूप अनूप निहारी । अहमित भयौ जीव तिहि बारी ॥
मोहित भा लखि रूप निकई । ताहि मोहमें गा गफिलाई ॥
आपा भूलि रहा नहिं चेता । महागमन मन भो ता हेता ॥
परमानंदमें गयो भुलाई । निजस्वरूपकी सुधि बिसराई ॥
तत्त्व प्रकृति पलटि गइ तबहीं । पक्कीसे कच्छी भई जबहीं ॥
कमही कम भै छीन शरीरा । धरिधरि देह पाव बहु पीरा ॥
जब कच्छा भा पक्का साँचा । अंड पिंड दोनों भा काँचा ॥
निज स्वरूपको ज्ञान न राखा । भई योनि चौरासी लाखा ॥
आपै आप रमे जग सारा । भरमे युनि अनंत अपारा ॥
नं. ९ कबीरसागर - ४