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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1444

( ६८ )

बोधसागर

अथ जैन यतिको बाइस परीसा वर्णन

सोरठा-भूख प्यास हिम गर्म, हंस मशक डँस नम्र तन ।
अरतिकेरे दुख पर्मे, चर्जा आसन शयन कह ॥
खल वध बंधन बाद, जाँचै नहीं अलाभको ।
रोग परस न विषाद, मलमय आदर मान विन ॥
प्रज्ञा अरु अज्ञान, दरस मलीन दो बीसये ।
जैन परीसा जान, सहै जाहि रिषि राय नित ॥

चौपाई

एकपक्ष जब दिन बित गैऊ । उन ओदर भोजन तब लैऊ ॥
विधिवत जौं भिक्षा नहिं पाई । अंग शिथिल मनमें हटताई ॥
पर अधीन भिक्षा ऋषि राया । प्रकृति विरुद्ध जो भोजन पाया ॥
ग्रीष्म काल विहाली ठानी । सहै प्यास मांगै नहिं पानी ॥
हिम ऋतुमें कम्पै संसारी । बाहर तबहि खड़े व्रतधारी ॥
वर्षा वायु शीतको जोरा । सहै सकल नहिं तन मन मोरा ॥
भूख प्यास उर अंतर दगै । कोपे पित्त देहज्वर जागै ॥
ग्रीष्म धूप अग्नि सो लागे । सहत सबीसन धीरज त्यागे ॥
दंश मशा माखी डँसै सर्पा । भाल शृगाल केहरी दर्पा ॥
कनखजूर आदिक दुख देहीं । पाड़ा सह हटता गह येहीं ॥
विषय विकार जासु उर भरई । भेष दिगम्बर सो किम धरई ॥
महाकठिन यह नम्र परीसा । सहै शील धर जैन मुनीशा ॥
देश काल कारण को पाई । जक्त जीव मन व्याकुलताई ॥
ऐसी अरति परीसा भारी । सहै जैन सुनिधर्म सँभारी ॥
तियहग तीर शरीर न लागा । जगमें को असजन्म सुभागा ॥
को अस जेहि रतिनाथ न चंपा । मन सुमेर मुनिको नहिं कंपा ॥
चार हाथ देखत महिं चारे । कठिन कंकरी पायँ विदारे ॥