कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजनधर्मबोध
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उदय अपरजा पति जिहिपाही । पूरी देहु तासुकी नाहीं ॥
प्रकृति प्रत्येक उदय जब होई । काय बनस्पति हो जिव सोई ॥
जड़ त्वचकाठ फूल फल पाता । बीज मही तरास कह साता ॥
सातभेद तन जिव तहैं एकू । सो जिव कहिये राम प्रत्येकू ॥
दो विधि प्रत्येक बनस्पति जानो । प्रतिष्ठित अपरतिष्ठित मानो ॥
धार अनंत रास जो कायक । ताहि प्रतिष्ठित कहै सुभायक ॥
जामैं नहिनि गोदको धामा । अप्रतिष्ठित प्रत्येक सो नामा ॥
काय बनस्पति कह साधारण । सूक्ष्म बादर दुविधि विचारण ॥
संग्रह एक एकही देहा । तिहि कारण निगोद कहयेहा ॥
पिंडनिगोद है रास अनंता । पूरित नभको पावै अंता ॥
सूक्ष्म बादर दोय प्रकारा । नित्य अनित्य नाम जो धारा ॥
गोलक रूपी पाँचो धामा । अँडर खँडर इत्यादिकनामा ॥
सो सब नरक पातको जानी । तिनको दुख को सकै बखानी ॥
जीव निगोध एक तन माही । एते जिव कछु वर्ण न जाही ॥
धरे जन्म सब एकै बारी । मरण एकठे मास बिचारी ॥
एक श्वास उच्छ्वासके माहीं । तिनको जन्म भरन असआहीं ॥
जन्म अठारह बारहैं जिनको । मरब अठारह बारहि तिनको ॥
एक श्वास उच्छ्वासहि काला । तिनके जन्म मरणकोख्याला ॥
एक निगोद शरीरके माहीं । एते अमित जीव तहैं आहीं ॥
तीन कालके सिद्ध जो नाना । तिनकै एक अंश परमाना ॥
जीवगोदकी कथा अनंतो । वर्णन इत न होय बुधवंतो ॥
साधारण प्रकृति जब लहई । ताते जिव निगोदतन गहई ॥
साधारण प्रकृत लो बरना । चौदह शाखा तामैं धरना ॥
शेष और जो चौदह रहई । ऐसो ताको व्यौरा कहई ॥
थिरप्रकृत तनमें थिरताई । अथिर उदैते तन अथिराई ॥