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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1423

जनधर्मबोध

( ४७ )

दिन औ राति कोइ जाने । रवि शशि उड्डुगण सकल डुराने॥
चन्द सूर नूर प्रचण्डा । पारिजात आमा नौ खंडा ॥
दरदर पर सुरतरु वर लागे । सकल नारि नर सुखमें पागे ॥

पूरबी बोल-छन्द बरवै

दमक देव डुम बमकै महि शशि सूर ।
गममि रहल चहुँ ओरवा चमकै नूर ॥
पूरन धरनि अकसवा जोति अपार ।
यक समान दिन रतिया नहिँ अँधियार ॥
छपे सुरतरुकी जोतिया लगनमें मन्द ।
एक न दीख नखतिया नहिँ रवि चन्द ॥
नर तिय सकल जुगलिया सब निस पाप ।
पुण्य पाप कछु नाहीं कर्म न थाप ॥
तब नहिँ बोध बिचरवा नहिँ गुरु शिष्य ।
कतहुँ न वरणाश्रम वासव सम दिष्य ॥
कतहुँ उग्र न सदवों रंक न राव ।
नर सुर विचर धरनिया कछु न बराव ॥
हिल मिल दोउ दल रहते जनु सँग भाय ।
भोग भूरि कल्पडुम काम पुराय ॥
महि सुख छाय स्वरगवा छबि सरसाय ।
हीरा लाल कि स्वनियां कविको गाय ॥
नहिँ कछु वेदन बानी नहिँ श्रुति छंद ।
धर्म न कछु अधरमवा सहजानन्द ॥

इति

अथ चौथा कालवर्णन

सोरठा-लागत चौथा काल, सुरतरुजबही लोप हो ।
नर गह न्यारी चाल, कृत चली कृतकाल तिहि ॥

नं. ९ कबीरसागर - ३