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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1413

आत्मबोध

( ३७ )

एक पग बांधिके अद्द झूलत रहै, एक ठादेश्वरी कष्ट कारी ।
एकगर्भमरते रहे पञ्चाग्निपतारहे, एक बैठिजलसेज आसनआरी ॥
कहाँ लौं कहूँ बहु रूपकोपेखनो, आप आपनपौ सवनेपिसारी ।
एक अन्न भोजन तजै दूबरंगनरहै, एकदूध भोजनकरै दूधाहारी ॥
एक लूनछोड़िके भये अलूनिया, एक बैठिके गुफामैलायतारी ।
एकतिलकमालादियेटोपचोलालिये, एकगुदढीपहरिकरिडिम्भधारी ।
एक पूजिकै मूर्तीगर्भ भारिधरी, एक शंखधुनिआरतीजोति वारी ।
सेव कीन्ही सहीदेवचीन्हानही, आत्माछोड़िभये जड़के पुजारी ॥
पूजिपाषान अभिमान अंधाफिरै, सतचेतनसूं बीच यारी ।
योगी पण्डित बडे सर्वगीता पढे, भर्मकी भीति नहिं टरतटारी ॥
कहै कबीर कोइ सन्त जन जौहरी, मेटि यमफन्द उठे संभारी ।
इतने विटम्ब सो वस्तु न्यारी रही, ज्ञानकीसुरतिसोल्योविचारी ॥
अगमकोगमकरोध्यानहृदयधरो, चढशून्यकीशिखरकरजिकिरभाई ।
फिक्रकोत्यागिनिजनामसो लागिकरि, सुषुप्ता ताँत तूतू बजाई ॥
गगनअरुधरनिबिचरुयाल अद्वुतरचा, गैवकीकलासतगुरुलखाई ।
कहै कबीर अब भोग पूरन भाया, ज्ञानके मौज वैराग पाई ॥
दौडदौडरेबालकाखबरिकरदर्बारमें, अलमस्तअवधूतफकीरआया ।
जाकेछाप अरुतिलकगलमालमस्तकवना, सत्तकी एकआवाज आया ।
खोलिपटदेखले जगमगीजोतिहै, नादअरु बिन्दुगठजीतकाया ।
कहै कबीर सर्वांग अविगत मिला, भर्मको छाड़िगुरुज्ञानपाया ॥
उलटि यंत्र धरो शिखरआसनकरो, देखसो देव दर्गाह माहीं ।
जहाँ तेल बाती बिनाअधरदीपकबलै, युक्तिकी जोतसो घटैनाहीं ॥
जहाँ तालतांतीबिना रागरमतासुना, पावैबिन निरत झंकारखाहीं ।
हाथबिनपांवबिनशीसमस्तकबिना, हुकुमहथियारबिन फौजधाई ॥
जहाँ जत्रतेजी नहीं गैद छाजे नहीं, युद्धमंडा तहाँ घाव नाहीं ।