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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 141

अनुरागसागर

( १३ )

छन्द

आदि उत्पतिकहोसतगुरु, कृपाकरी निजदासको ॥
बचन सुधा सु प्रकाश कीजै,नाश हो यमत्रासको॥
एक एक विलोयबर्णहु, दास मोहि निज जानिकै॥
सत्य वक्ता सदगुरु तुम,लेव निश्चयमानिकै॥१०॥
सो० निश्चयबचनतुम्हार,मोहि अधिकप्रियताहिते॥
लीला अगम अपार,धन्यभाग दर्शन दिये॥१०॥

कबीर बचन

धर्मदास अधिकारी पाया । ताते मैं कहि भेद सुनाया ॥
अब तुम सुनहु आदिकी बीनी । भाषां उत्पति प्रलय निशानी॥

सृष्टिके आदिमें क्या था ?

तबकी बात सुनहु धर्मदासा । जबनहिंमहिपाताल अकाशा॥
जब नहिं कूर्म बराह और शेषा । जब नहिं शारदगौरिगणेशा ॥
जब नहिं हते निरंजन राया । जिन जीवनकहवां धिङ्गुलाया॥
तेतिस कोटि देवता नाहीं । और अनेक बताऊ काहीं ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश न तहिया । शास्त्र वेद पुराण न कहिया॥
तब सब रहे पुरुषके माहीं । ज्यों बट वृक्ष मध्य रह छाहीं॥

छन्द

आदि उत्पति सुनहु धर्मनि,कोइ न जानत ताहिहो॥
सबहि भो बिस्तार पाछे,खास देउँ मैं काहि हो ॥
वेदचारो नाहिं जानत, सत्य पुरुष कहानियाँ ॥
वेदको तब मूल नाहीं,अकथकथा बखानियाँ॥११॥
सोरठा-निशकारतैं वेद, आदिभेद जाने नहीं ॥
पण्डित करत उछेद,मते वेदके जग चले॥११॥