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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1408

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बोधसागर

सांचकरतूतितहांआप हाजिर खड़ा, कपटकरतूततहां आपनाहीं ।
कहैं कबीर सब संतजन कहत हैं, वेद कितेबहु देख माहीं ॥
नामनिर्गुण कहैं रहत हैं गुणमई, सुखसूं कहत नहिलाज आवै ।
कामअरुकोधघटमाहियोधासबल, ज्ञानअरुध्याननहिरहनपावै ॥
जासुके झूपडे लाय लागेसहीं, झूपडा मांहि क्या रहै भाई ।
कोधसी अग्नि तहाँ देखु प्रकटभई, कहैंकबीर यह कैसी कमाई ॥
कहतभी खूब जो रहित रजमारहै, कहतभी खूब जो सांचबोलै ।
कहतभी खूब सबत्यागि साईभजे, कहतभी खूब मनमैल खोलै ॥
रहत रजमाविना नफा नाही कछु, कहा आकाशका शब्दबोला ।
कहैं कबीर सुनु शब्द सांचाकहूं, कहा जो प्याजकाछोतछोला ॥
सांचके शब्दको सुनत निंदाकरे, झूठके शब्दसूं प्यार होता ।
झूठ अरु सांचएकठे क्यों रहें, जमीं आस्मान नहीं एकहोता ॥
प्रवृत्तिप्रपंचसब जमींका खेलहै, गुणातीतअवधूतका खेलनाई ।
कहैं कबीर कोइ रीझभावेखीझिहै, कहांगे सांच नहिं झूठ भाई ॥
सांचके शब्दमें पक्ष कोई नारहै, पक्षतो सांचका शब्द कैसा ।
सांचके शब्दमें पाप लागे नहीं, झूठके शब्दमें पाप वैसा ॥
साधुकी चालतो सांच सबकहतहैं, झूठतो साधुकीचाल नाही ।
कहैं कबीर यह खेल आकाशका, साधुपद दूरकहूं निकटनाहीं ॥
सांचका शब्द तो एकही बहुत है, बारही बार नहीं बकनाजी ॥
पाषाणके बीचमें तीरलागेनहीं, यों मूढसों बहुत नहीं झकनाजी ।
रैनदिन होत घनघोर वर्षाघणी, चीकटे घडे नहिं पुनगलागै ।
कहैं कबीर तहाँ कर्मकी जोड है, जीवजड होरहा कहां जागै ॥
पाषाणके बीचमें तीर बेधेनहीं, बाहनेहार क्या दोष भाई ।
सुनतही सुनत सबअवधि पूरीभई, इन्द्रियाद्वार मनजहरखाई ॥
कर्मसत्राहकी कडीसजडी जड़ी, ज्ञानगोली तहाँ नाहिं लागै ।