कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1406, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३० )
बोधसागर
मियाजीआबकानीपनाहक दर्गाहमें, पिशाबकानीपनाहकनाहीं ।
कहर कोडुरि मिहरदिलमें धरो, यो बन्दगी करत कबूल साई ॥
पांचबिसमिलकरो पाकरोजा धरो, गुस्सेका गला तूका भाई ।
कहैं कबीर यह सत्यका शब्द है,विहिस्तकी राहकं सहज नाई॥
जैनके मांहि तो खेन पैदा हुआ, खेनका रोग तो जाय नाहीं ।
कण बिना तूसडा कूटते हैं सदा,कर्ममें लीन नहिं सांच पाई ॥
दयाको कहै अरु सदा निर्दई रहै, तोडि सर्जीव नरजीव पूजै ।
कहैं कबीर यों जन्मका आँधला, सांच अरु झूठ नाहिं सूझे ॥
खेनके रोगते श्वांस बैठे नहीं, श्वांस बैठे बिना कहां साता ।
नामनिज औषधीनिकट न्यारीरही,छाडि निजऔषधी कर्मराता ॥
आपप्रकाश बिन कहा नहीं ऊपजे, कालके चक्रमें खाय फेरा ।
कहैं कबीर यों जैनमें खेन हैं, नाम निर्वाण नहिं निकट हेरा ॥
कौड़ियां कौड़ियां जोड़ी करि एकठी, खाय खचै नहीं मूलपापी ।
धरै घरमाहिं फिर व्याज बाढो करै, रैन दिन माहिले बुरीथापी ॥
दोयगा सर्प अरु भूत भर्मत फिरै, खाय खचै नहीं मूल भाई ।
कहैं कबीर जब ज्वाब कैसे भरे, यमराज के घेसले खूब खाई ॥
शब्द उपदेश मैं सबनकं कहत हूं, समुझिकरिआपनासूखलीजे ।
राग अरु द्वेषकूरूरिसब छोडिके, आपने जीवका भला कीजे ॥
आय सतसंगमें कुबुधिको दूरिकरि,सुबुधि सन्तोषउरमाहिंधारो ।
कहैं कबीर यह शब्द निर्दोष है, आपने जीवका काज सारो ॥
टेरि पुकारि सब जीवसों कहत हौं, सत्यका शब्द तुम गुनलोई ।
गुरुदेव करतूत गुरु देवही पाइये, शिष्यकरतूतसो शिष्य होई ॥
शिष्य दुर्बुद्धि गुरुदेव क्या दोषहै, शिष्य अवधूत गुरुवार वैसा ।
करै करतूति सो आपनी पाइहै, शिष्यगुरुदेवका काम कैसा ॥
शब्द सांचा कहूं गुप्तका कामना, सांचके शब्दको लाज कैसी ।