कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1404, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( २८ )
बोधसागर
पीवको परसता कष्ट बहु होत है, पीवकी सेज नहिं खेलहांसी ।
कहैं कबीर रहत रजमा बिना, शब्दअनुभवकियाबांधिजासी ॥
त्यागवैरागअरुहरतरजमाबिना, शब्दअनुभव किया कौन मानै।
नूर अरु तेज मन पवन कू कथतहै, महल चौथातणी बातठानै॥
खेतनिपेदे हुई चौडेही जानिये, शीलअरु साँच संतोष आवै ।
कहैं कबीर एता दृष्टि देखिये, वेदांत सिद्धांत सब साधु गावै ॥
सोवता होय तो जागि है बापुडा,जागता सोवता कहाँ जागै ।
मान मनमाहिं अभिमान ज्ञानी हुआ,शब्दअवधूतकाकहाँ लागै॥
कहतअरु सुनतसबअवधिपूरीभई, अनुपाइनीभक्तिनिहिहाथआई ।
कहैं कबीर ये ज्ञान सब थोथरा,जीवका भला क्यों होय भाई ॥
कहतअरुसुनत सबअवधिपूरीभई, उलझिसुलझिनहींएक आंटा ।
शीलअरुसांचसंतोषअन्तर नहीं, कामनाकुबुधिउरमाहिं काटा ॥
अग्निकेसंगज्योलारखपघिलतचलै, योशब्दकोसुनतटुकचेतहोवै ।
कहैंकबीरनरपढै जबआंतरा, लाल की लाखनहिं उलटि जीवै ॥
करत आचारअरुखबर तनकी नहीं, सदा नौ द्वारमें बहै आमैं ।
नाकमें रीट अरुआँमैंकीचड़ा, सदा ठेठी बहै कान तामैं ॥
हाडमुखलार अरु मूत्र विष्टा बहै,करत अभिमान तू देख जायैं।
कहैं कबीर नर चेत सोवै कहाँ, होयज्योंपाकभजिसन्त नामैं ॥
फोड़िपाषाण को दूजी हरिबीच करि,आपकर्ता हुआ देखु दूजा ।
तोड़ि सरजीव अरु पूजिनिर्जीबको, कहो क्यों मानिहै रामपूजा॥
कर्म मार्ग चढै सांच बूझै नहीं, मानता है मैं करत पूजा ।
कहैं कबीर नर अंध चेते नहीं, फूटि चारो गई पडा दूजा ॥
जागती जोति तहाँ छूत लागे नहीं, छूत लागै तहाँ भर्म भाई ।
कर्म अरुभर्ममें जीव जूझै सबै, चार अरु असी कापडा खाई ॥
शोचके शब्द का भेद पावै नहीं, इन्द्रिया स्वादसब जीवलागा ।