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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1395

आत्मबोध

( १९ )

ये सदानिर्द्वन्द्व कोइ द्वन्द्वव्यापेनहीं, गुरुदेवकेशब्दतेस्मृति लागी॥
तत्त्वस्मृति अरुगत सबगुण किया, प्रकटी अग्नि सब भर्म भागा ।
कहैं कबीर संसार सब गलत है, नहीं ज्ञानका ओढना सदा नागा ।
नरकका जीव सब नरकमें मिलरहा, नरकविन और नहिं बात आवै ।
नरकमें उपज्या नरकमें खपेगा, रैन दिन नर्कके माहिं ध्यावै ॥
शील अरु साँच संतोष सूझै नहीं, इन्द्रिया द्वार रस जहर पीवै ।
कहैं कबीर नर सही सो मरेगा, बिना हरि आसरे कहाँ जीवै ॥
नाम गुरुदेव अरु शिष्य है नारिका, कपिज्यों नाचता फिरत भाई ।
देत है ठान तब करत उनमाद नर, बन्दगी करत है चित्त लाई ॥
करत सँघार अरु खानको देत है, गुड अरु सूठ बूरा विसाई ।
कहैं कबीर यह अकिल अज्ञानकी, कहत गुरुदेव नहीं लाज आई ॥
बारहि बार मन पवनको सोधि नर, पाँच प्रमोधि करि नाम लीजे ।
भांग अरु तमाकू खाय अफीमको, कालके जालमें न्याय छीजे ॥
भांगकी तोरमें रैन दिन फूलिया, भजन प्रतापका सुख नाहीं ।
कहैं कबीर सुनु शब्द साँचा कहूं, समझविचार करि देख माहीं ॥
कहनको साथ अरु व्याध छूटैनहीं, कोटिमें पाव या देख भाई ।
खेत अरु कुवा फिर व्याज बाढो करै, बलधिया हाँक करि देत खाई ॥
नामको फेरि करि जगत धूता सबै, नागिनी नारि घर बार पूरा ।
कहैं कबीर मन माहि फूला फिरै, काल शिर बाजि है देख वूरा ॥
प्रतिग्रह झेलता डरता नाहिं है, कौन गति होइ है जीव थारी ।
होयगा ऊंट अरु बाड़िको चरैगा, सो डरता फिरैगा बन सारी ॥
पायकी पोटको डारिरे पापिया, पछै भी भार तलब है भारी ।
कहैं कबीर नर अंध चेतै नहीं, बात सांची कहूं लगे खारी ॥
साधु जो होय तो व्याधको नाश कर, व्याधके नाशते साधु होवै ।
वासना व्याधि सब जीवको दहत है, बिना गुरुदेव कह कौन खोवै ॥