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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1393

आत्मबोध

( १७ )

कहैं कबीर कोइ जूझि हैं सूरमा, कायरा भीरु तहां धरडिभाजै ॥
शूर संग्रामको देखि सन्मुख मँडा, शीश दे नाथको साथ हुआ ।
कमदकीलो कियो फौजमांही पड़ा, पिसन पाँचुदलजीति जुवा ॥
ज्ञान शमशेर ले भूमि सवसर करी, जाय निर्बानपद किया बासा ।
कहैं कबीर रणधीर निर्भय हुआ, शीस जगदीश जगजीति खासा ॥
साधुका खेल तो विकटबैडा मता, सती औ सूरकी चाल आगै ।
सूर घमसान है पलकएक दोयका, सती घमसान पलकएक लागै ॥
साधु घमसान है रैन दिन जूझना, देह प्रयंत का काम भाई ।
कहैं कबीर टुकबाग ढीली करै, तो उलटि मनमगनसौ जमी आई ॥
साधु पद कहत तो बात अगाध है, साधु का खेल तो कठिन भाई ।
होयमरजीवता गत सब गुण करै, साधु पद भला तो हाथ आई ॥
अवनिकै गुण धरै रहत गिरि मेरुज्यों, किलाको देखि नहि छोभ पावै ।
कहैं कबीर कोइ रेख नहि ऊपजै, साधु पद भला तो हाथ आवै ॥
नाच आवै तबै काछको काछिये, नाचविनकाछ किस काम आवै ।
पहिरि सन्नाह धरि नाम रणजीतको, बेरघमसानके कूदि जावै ॥
उत्तरे नूर अरु श्याम नहि आदरे, दाद दर्गाह में नाहि पावै ।
सिंहकी खाल अरु चाल है भेडकी, कहैं कबीर तब सियालखावै ॥
ब्रह्म चौगान तहाँ ज्ञानकी गेंद है, रमत अवधूत कोई सन्त सूर ।
सुरतिके दंडसोफेरि मन पवनको, शब्द अनहद तहाँ बजे तूरा ॥
सदारसएकतहाँ मूठिनही विभचरे, कालसेतीलडै रैन दिन होय घमसानमाही ।
कहैं कबीर यह विकट बैड़ा मता, कायरा खेल का काम नाहीं ॥
सकल संसारमें एक चीपि फिरि, शील अरु सांच संतोष नाहीं ।
जगत अरु भेष सबएक नाकै चला, जत अरु सत्त कहाँ ठौर पाहीं ॥
दम्भपाषंड संसार सब मिलत है, सांचके शब्दको नाहि मानै ।
कहैं कबीर यह खेल बारीकहैं, साधुके राहको कौन जानै ॥

मो० सा०