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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 139

अनुरागसागर

( ११ )

सार शब्द क्या है

सार शब्द विदेह स्वरूपा । निअच्छर वहि रूप अन्नूपा ॥
तत्त्व प्रकृतिभाव सब देहा । सार शब्द नितत्त्व विदेहा ॥
कहन सुननको शब्द चौधारा । सार शब्दसों जीव उबारा ॥
पुरुष सु नाम सार परबाना । सुमिरण पुरुष सार सहिदाना ॥
बिन रसनाके जाय समाई । तासों काल रहे सुगझाई ॥
सूच्छम सहज पन्थ है पूरा । तापर चढो रहे जन सूरा ॥
नहिं वहाँ शब्द न सुमरा जापा । पूरन वस्तु काल दिख दापा ॥
हंस भार तुम्हरे शिर दीना । तुमको कहों शब्दको चीन्हा ॥
पदम अनन्त पँखुरी जाने । अजपा जाप डोर सो ताने ॥
सुच्छम द्वार तहां तब परसे । अगम अगोचर सत्पथ परसे ॥
अन्तरशून्य महिहोय प्रकाशा । तहँवाँ आदि पुरुषको बासा ॥
ताहिं चीन्ह हंस तहँ जाई । आदि सुरत तहँ लै पहुँचाई ॥
आदि सुरत पुरुषको आदी । जीव सोहँगम बोलिये ताही ॥
धर्मदास तुम सन्त सुजाना । परखो सारशब्द निरबाना ॥

सारशब्द ( नाम ) जपनेकी विधि गुरुगमभेद छन्द

अजपा जाप हो सहजधुना, परखिगुरुगम डारिये ॥
मन पवनथिरकर शब्द निरखै, कर्ममनमथ मारिये ॥
होत धुनि रसना विना, कर माल विन निरवारिये ॥
शब्दसार विदेह निरखत, अमरलोक सिधारिये ॥ ५ ॥
सोरठा-शोभा अगम अपार, कोटिभानुशशिरोमहका ॥
षोडश रवि छिटकार, एकहंस उजियार तनु ॥ ५ ॥

धर्मदासका आनन्दोद्गार

हे प्रभु तब चरण बलिहारी । किये सुखी सब कष्ट निवारी ॥
चक्षुहीन जिमि पावे नेना । तिमि मोहि हरष सुनत तव नैना ॥