कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअनुरागसागर
( १ )
शिवनवशीकरण
इन्दी दुष्ट महा अपराधी । कुटिलकाम होई विरलेसाधी ॥
कामिनि रूप कालकी खानी । तजहु तासु सँग हो गुरुज्ञानी ॥
कामवशीकरण
जबही काम उमंग तन आवै । ताहि समय जो आप जुगावै ॥
शब्द विदेह सुरत लै राखै । गहिन मन मौन नामरसचाखै ॥
जब निहतत्त्वमें जाय समाई । तबहीं काम रहै सुरझाई ॥
कामदेव लुटेरा है । छन्द
काम परबल अति भयंकर, महा दारुण काल हो ॥
सुरदेव मुनिगणयक्षगंधर्व, सबहि कीन्ह विलास हो ॥
सबहि लूटे विरल छूटे, ज्ञान गुण निज हट गहे ॥
गुरुज्ञान दीप समीप सतगुरु, भेदमारग तिन लहे ॥ ७ ॥
कामलुटेरेसे वचने का उपाय
सोरठा-दीपक ज्ञान प्रकाश, भवन उजैरा करि रहौ ॥
सतगुरुशब्द विलास, भाज चोर अँजोरा जब ॥ ७ ॥
अनलपक्षिका दृष्टान्त
गुरु कृपासों साधु कहावै । अनलपच्छ है लोक सिधावै ॥
धर्मदास यह परखो बानी । अनलपच्छ गम कहाँ बखानी ॥
अनलपच्छ जो रहै अकाशा । निशि दिन रहै पवनकी आशा ॥
दृष्टिभाव तिनरति विधिठानी । यह विधिगरभ रहेतिहिजानी ॥
अंडप्रकाश कीन्ह पुनि तहवां । निराधार आलंबहि जहवां ॥
मारग माहिं पुष्टु भो अंडा । मारग माहिं त्रिरह नौखण्डा ॥
मारग माहिं चक्षु तिन पावा । मारग माहिं पंख पर भावा ॥
महिद्विग आवा सुधि भइताहीं । इहां मोर आश्रम नहिं आहीं ॥
सुरति सम्हार चले पुनि तहवां । मात पिताको आश्रम जहवां ॥