कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1365, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमुद्रा
( २१५ )
निरगुन अंश लीन्ह हम जानी । ध्यान मंत्र प्रभु कहो बखानी ॥
आगे बिने करों बहु बारा । ताको भेद कहो निरधारा ॥
जीव मुक्तको भेद बताई । आपन करमो कह मुक्ताई ॥
विनती करो दोग्य कर जोरी । ध्यान मंत्रकी भाषों डोरी ॥
ताको मता धरोजिन गोई । मोसो वर्ण सुनावो सोई ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो भेद निर्वाना । जीवमुक्ताको कहों प्रमाना ॥
मंत्र ध्यानको बणों अंगा । ताको भाव कहों प्रसंगा ॥
आदि मंत्र मैं देहु बताई । जाके बल हंसा घर जाई ॥
सोई जाप अंतर लो लाई । अंतकाल ताको नहिं खाई ॥
ऐसा तुम्हे कहों उपदेशा । अंतर ध्यानको कहों संदेशा ॥
प्रथमहि जो सुख आसन लावै । राजस योग तब करे बतावै ॥
काया कष्ट न व्यापै कोई । राजस योग पुन कहिये सोई ॥
पांच पचीसकी सुतं बिसारै । अस्थिर बैठ ध्यान उचारै ॥
बैठ शून्य महलमों जाई । तबे निरंतर ध्यान लगाई ॥
प्रथम विरह वैराग समावै । रचना सकल तहाँ बिसरावै ॥
एक पुर्ष एक आपको जानै । द्वैत अकार शून्य पहिचानै ॥
तबही ध्यान समाध लगाई । जाकी सुतं अन्त नहिं जाई ॥
दहिनो अंग श्वास जब आवै । तबे ध्यान महाँ सुतं लगावै ॥
पिंगला अंग पुर्षको बासा । बाँये अंग शक्त प्रकाशा ॥
शक्त अंग कह देहु बचाई । दक्ष अंग वह सुतं लगाई ॥
प्रथम रूप सोहंग उचारा । तामों लखो पवनकी धारा ॥
तामहँ अर्ध पवन जो कहिये । सोहंगनाम पुन तामों लहिये ॥
प्रथम ध्यान धर देखे सोई । अंग अंग की पचै होई ॥