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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1360

( २१० )

बोधसागर

निरगुण मो मन लीन रहु, करे जीव गतनाश ।
बहुर काल बश ना परे; अजर अमाघर बास ॥
जिन संतनको यह मता, बरनत बने न मोहि ।
तिन पटतर का दीजिये, कहि समुझाऊं तोहि ॥
संतकोट वारो जहाँ, ज्ञानी लक्ष अनेक ।
जो निरगुनमें रत सदा, सो अनंतमें एक ॥

सुक्ति बचन--चौपाई

हो समर्थ मैं तुव बलिहारी । संतन महिमा कहो विचारी ॥
संतरूप कैसे पहिचानी । महिमा तासु कौन विधि जानी ॥
कैसे भेद तासको पावै । कैसे परम संत बस आवै ॥
और संत एक देहु बताई । तुमको आहु कहाँते आई ॥

योगजीत बचन

हो सुक्ति मैं कहों बखाना । तुमसों भेद कहों निर्बाना ॥
अपनी उत्पत्त देहु बताई । तुम्है भेद कछु नाहे दुराई ॥
आदि भेद अब कहों बुझाई । तुम सुक्ति सुनियो चितलाई ॥
प्रथमहि पुर्ष आप निबाना । तब नहि रचना अश बखाना ॥
जबै पुर्ष मन इच्छा आई । षोडश अंश तबै उपजाई ॥
चौदह सुत तहाँ रहे छिपाई । तिनको भेद कोई नहीं पाई ॥
सक्त निरंजन तब उपराजा । जिन सब कियो मृष्टिको साजा ॥
तिनसों त्रिगुनरूप प्रकटाया । जिनसों भई सबनकी काया ॥
तिन पुन चारों वेद बखाना । तामें जीव सबे लपटाना ॥
चारखान तब प्रकट कीन्हा । तेहिमें फाँस जक्त सब लीन्हा ॥
फिर पुत चउदह यम उपराजा । तब चौरासी कीन्ह समाजा ॥
तीरथ व्रत औ नेम अचारा । दान पुण्य जप मंत्र विचारा ॥
इतना करे जगतमें कोई । यमकी त्रास न छूटे सोई ॥