कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमुद्रा
( १९९ )
सुक्ति वचन
इन्द्री नाभी तब नाहीं स्वामी पवन कहा तब बासा ।
जादिन अनहद रूप नहीं तब शब्द कहाँ पकीशा ॥
ब्रह्मांड ना तो तब ब्रह्म कहाँ तो गगन नहीं कहाँ हंसा ।
निरूपम विना शून्य कहाँ कहिये भेद कहौं प्रकाशा ॥
आकार नहीं तब जीव कहाँ तो चन्द नहीं तब शीऊ ।
सुखमन नहीं तब कहाँ निरंजन ससुझाय कहो सब भेऊ ॥
योगजीत वचन
इंद्री विन मन हतो निरूपम निराकारमें प्रवना ।
अलख रूपमें शब्द बासतो अविगतिमें तब प्राना ॥
अविनाशीमें हंसबास तो शून्य कालमें बासा ।
ऊँकारमें काल बास तो ऐसा भेद प्रकाशा ॥
जीव शीवमें प्रथमो बासा शीव निरंजन माहीं ।
सबको बास प्रकट कर भाखों भेद कहैं तुम पाहीं ॥
सुक्ति वचन
कहाँते उत्पत भयो निरंजन कहाँ शीव उत्पानी ।
काल जीव कहाँते प्रकटो शून्य भयो केहि खानी ॥
कहाँते उत्पत भये अविनाशी कहाँते उत्पन हंसा ।
कहाँते उत्पन ब्रह्मभयो है प्राण भयो कह अंशा ॥
शब्द पवन मन कहाँते उत्पन कहाँते प्रकटो जीऊ ।
सबके उत्पन मोसों भाखों केहिबिधि प्रकटो शीऊ ॥
योगजीत वचन
आदि ब्रह्मते भयो निरंजन तहाँते प्रकटो शीऊ ।
तौन भेद तुमसों कहो सुक्ति शिवते उपजो जीऊ ॥
जीवते उत्पत काल भयो है कालते भयो ओँकारा ।
ओँकारते शून्य भयो है शून्यते जोत प्रकारा ॥