कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1347, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चसुदृढा
( १९७ )
सुक्ति वचन-चौपाई
सुक्ति कह सुन सत्यगुरु ज्ञानी । अगम कथा कहीं अन्तरयार्मी ॥
और कथा अब मोसों भाषों । जो पूछों सो गीय न राषों ॥
हंस अवधको भेद बतावो । तास मर्म सब मोहि सुनावो ॥
आगम वरष मासषट जानो । तो कछु अपने निजमत ठानो ॥
ताको भेद कहों समुझाई । सो मोहि सतगुरु भेद लखाई ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो सत् मम वानी । भिन्न भिन्न मैं कहों बखानी ॥
पाचघरी बांये सुर पाई । सोई दहिनो श्वासा चलाई ॥
दशश्वासा सुखमन जो कहिये । ताको भेद बराबर लहिये ॥
आठ पहर पिंगला सुर हालै । बरष तीसरे हंसा चालै ॥
आठ दिवस दहिनो सुर बहै । हंसा अवध वर्ष दोय रहै ॥
सोरह दिन पिंगला सुर बोले । वर्ष एक मो हंसा डोलै ॥
वीस रैयन दिन दहिनो पाई । तब षट मासमें हंस चलाई ॥
एकति सरोज दक्षस्वरको जानो । तब दोय दिनमें हंस पयानो ॥
पांचघरी सुखमन जो हालै । पांचघरी मो हंसा चालै ॥
चन्द सूर सुषमन छपजाई । सुखसे तीजो पवन चलाई ॥
ऐसी विधि पवन चलाई । पहर माहिं हंसा चल जाई ॥
साखी-धूम मंडल दीखे नहीं, जोत न नेत्र लखाय ।
छठे मास हंसा चले, बचै न कोट उपाय ॥
छाया शीस दीखे नहीं, भुजा शिखर ना दिखाय ।
दीप बास आवै नहीं, छठे मास चल जाय ॥
गगन शब्द गरजे नहीं, नेत्र गुञ्ज छपजाय ।
मास एकके अवधमें, हंसा तन तज जाय ॥
भैवरगुफा तिल ना लखे, पुतरी जब चढ़जाय ।
पहर एकमें जानिये, हंसा तन तज जाय ॥