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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1341

पञ्चमुद्रा

( १९१ )

नवै कमल आदको जानो । जाते निरगुण पुर्ष बखानो ॥
एकइस हजार छैसे जाप कहिये । सो सब पुर्ष ध्यानमें लहिये ॥
अष्ट कमलको भेद बताई । और ज्ञान अब भाषो भाई ॥
स्वासाको प्रमाण अब भाषो । तेहि प्रभाव प्रकटकर राखों ॥
अब स्वासाको भेद बताऊँ । जाको मर्म कोई नहीं पाऊँ ॥
अमी अखण्डते वर्ष धारा । तहाँते स्वास होय गुंजारा ॥
निसवासरको जाने मूला । स्वासा सार शब्दसमूला ॥
दशयै घरते स्वासा आवै । कछु नाभी कछु अलख चढ़ावै ॥
निस दिन चले स्वासाकी धारा । सातसे आगर साठि हजारा ॥
अमी कमल अमान सो नाला । अढ़ाई दल पखुरी रिसाला ॥
तहाँते चले पवनकी धारा । स्वासा माहे शब्द गुजारा ॥
उनचालिस हजार एकसे आवै । एतिक चिकुर द्वारसो धावै ॥
ह्दे कमल होय स्वासा आवै । एकइस हजार और छैसे धावै ॥
एता जाप तहाँ प्रवाना । एकइस हजार और छैसे जाना ॥
एतिक स्वासा ह्दे ले आवै । क्षिन बाहिर क्षिन भीतर धावै ॥
दुसरा कमल है झिलमिल माही । झलके जोत अधर धुन ताही ॥
सहस्र पखुरी कमल अन्ना । तहाँ बसे मन जीत सरूपा ॥
ताहे कमल पर बाजा बाजै । सत्तर बाजा तहाँ विराजै ॥
तहाँ घरनी घरियार बजावे । घरी घरी टंकोरा लावै ॥
छैसे औ पचहत्तर स्वासा । एतिक एक घरी प्रकाशा ॥
एतिक स्वासा कमत युगमाही । तब घरनी घरियार बजाही ॥
या विधि चार टँकोरा ठोकै । राहु केतु संग ब्यालि न रोकै ॥
पहर एक करे धुन पूरा । गृहण गिरासे शशि औ सूरा ॥
गहन गिरा सत निसरे स्वासा । रवि शशि राहु केतु प्रकाशा ॥
तेहि संग एक सापनी रहई । घरीघरी वह जीवको गहई ॥
श्वासा सोरह ग्रहण लगावै । छटे मास तेहि काल सतावै ॥