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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1335

पञ्चमुद्रा

( १९५ )

आठो अंग रचो अस्थूला । शिव शक्ती दोनों समतूला ॥
सोई अंग शक्त सोइ ईसा । एकै रूप एक समदीसा ॥
नख सिख रचो गर्भस्थाना । सातद्वीप नौखंड बखाना ॥
प्रथमहि ब्रह्म द्वीप निरमावा । ताऊपर बहु रचना लावा ॥
एकद्वीप नौखंड बनाई । त्रिकुटी सात तहां निखाई ॥
एकद्वीपमहैं सातो नाला । सातोनाल सात हैं चाला ॥
सरवर सात कमल है साता । रंग पांच पांचौ उत्पाता ॥
त्रिकुटी मध्य एकहै कीला । तहां देखिये रंगरसीला ॥
ता कीलामह कानी लागी । पवन सनेह आत्मा जागी ॥
ता कीलामह लागी डोरी । खूटा लगा पवन झकझोरी ॥
झूले मन पवन झूलावै घेरी । एक घर शून्य एक घर फेरी ॥
खूटा होयके पवन झकोरी । इंगला पिंगला सुखमण जोरी ॥
रविशशि पवन गहे मन जोरी । खूटा लाग पवनकी डोरी ॥
मेरे डंडपर खूटा गाड़ा । नदी तीन ताऊपर बाड़ा ॥
खूटातरे नदीत्रिय बहई । तीननदी बिच खूटा रहई ॥
खूटाके दहिने दिश गंगा । अति शीतल बहै नीर तरंगा ॥
सूरसनेह नीर हिय पसैं । सुर्तसनेह धनी तहैं दसैं ॥
खूटाके है बांये अंगा । यमुना नदी बहे अतिरंगा ॥
सुखमन सरस्वती नीर तरंगा । लहर लालच तेज विष अंगा ॥
तहां बसे सरयू तेहि साथा । रावल एक बयालिस हाथा ॥
काल अनन्त रूप रस नाथा । बसे अघर दीखे नहिं माथा ॥
बाढी नदी दोइ विकरारा । शीतल तेज बहे दोउ अधारा ॥
तिसरी नदी गुप्त पर्वाहा । अविगत जल बहेअगमअथाहा ॥
खूटा तरे होय नदी सिधारा । चली सरस्वती फोरि पहारारा ॥
मध्य लहर रस विषके खानी । गंगा यमुना बीच समानी ॥