कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1333, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमुद्रा
( १९३ )
चन्द सनेह होय जो हीना । महासूल तन होय मलीना ॥
श्वासा घरी सातसे भारी । युगकमोदकी कथा निनारी ॥
युगकंकवत होय पैसारा । चौथी घरी कोध अधिकारा ॥
ताकी घरी निकट जब आवै । सतयुग अंत कंकवत पावै ॥
सतयुग अंत होन नहि पावै । युग कंकवत आन समावै ॥
युगकंकवत काल दुखदाई । काया कहर गिरासे आई ॥
युगकंकवत कालकी वाजी । कलह विकार सब जगमों साजी ॥
युगकंकवत महाबल योधा । अंतकाल सतयुगसों कोधा ॥
सतयुगअंत कंकवत माही । अंतकालकी व्यापे छाहीं ॥
युगकंकवत मोहकी छाहीं । काम कोध ममता लपटाहीं ॥
अंतकाल सतयुगके भयऊ । चारो युग परले तर गयऊ ॥
चारों युगका भेद बतावा । अगम निगम सब भाष सुनावा ॥
साखी—एके युगके बीतते, चारों गये बिनास ।
एक नाद चारों युग खायो, सतयुग कीन्हो ग्रास ॥
किलक कमोद चंदके नेहा । कमत कंकवत सूर सनेहा ॥
भये युग अंत एक संगचारी । चार शब्द एक नाद सँघारी ॥
एक नाद एक पहर कहावै । चार घरी एक माहि समावै ॥
चार घरी चारों युग बीतै । शब्द नाद रवि शशिघर जीतै ॥
सतयुगको तब भयो बिनाशा । त्रेतायुगको भयो प्रकाशा ॥
दूसर युग तब भौ विश्वासा । दूसर पहर तत्त्व प्रकाशा ॥
तेज लगन श्वासा अनुसारी । ताते त्रेतायुग संचारी ॥
त्रेता युगकी पखुरी चारी । चार घरी युग चार बिचारी ॥
जस युगअंत सतयुगमों देखा । सोई युग त्रेतामों लेखा ॥
जब जब अंत होय युग केरा । तब तब नादकाल घन घोरा ॥
नं. ८ कबीरसागर - ७