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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1329

पञ्चमुद्रा

( १८९ )

प्रथमहि जीवरूप पहिचानो । प्रथमै ताके चेला जानो ॥
औ पुन हंसरूप है भाई । पानी चेला तास बताई ॥
चेतनरूप गुरु है सोई । चेला तेज तासुको होई ॥
निरालंब गुरु पहिचानो । वाय तासको चेला जानो ॥
अलख निरंजन गुरु बखाना । चेला आकाश तासको जाना ॥
गुरु शिष्यको भेद बताई । अब तत्त्वनकी परष लखाई ॥

छंद-चौकोर मंद और शुद्धपुरी धरनी है सोई ।
नीचे शीतल मंद चले जलको तत होई ॥
तेज तत्त्व जो ऊंच आगमनकी आइसु होई ।
दहिने बांये चले बाँये तत्त्व जानो सोई ॥
सबुजके मध्य सुखमना पवन गगनको जानिये ।
आकाश नाम तासों कहि पाँचों तत्त्व बखानिये ॥
नाभी गंध समान पवनको अंश बखानो ।
ह्दे माही प्राण अगिनको अंश सो जानो ॥
कंठ बसे आपान अंश तेहि जलको जानो ।
गगन बसे उद्यान अंश आकाश बखानो ॥
सब देहीमें ब्यान है अंश पृथ्वीको जानिये ।
पंच प्राण ये जानिये अंशहीते पहिचानिये ॥

चौपाई

पंचप्राणकी संघ लखाई । अब उनमुनिको भेद बताई ॥
मुद्रापांच प्रकट मैं भाषा । तामहि श्रेष्ठ उनमुनि राखा ॥
चारोंके परे उनमुनि कहिये । अलखरूप पुनि तामों लहिये ॥
सोई ब्रह्मज्ञान कहलावै । धरे ध्यान तहां अमृत पावै ॥
पावे साध अमीरस पीवै । सो योगी जग युगयुग जीवै ॥
ना फिर आवै ना फिर जाई । अखंड मंडलमें रहे समाई ॥