सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1306, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1306

( १६६ )

बोधसागर

साखी-वचन तुम्हारा मानेऊ, राखि शब्दकी कानि ।
नीर जलानिधि सोखिके, मेटत सब उत्पानि ॥

पुरुष उवाच

वाणीपुरुष अथरसे कहेऊ । जाउ कूर्म मागि सो लेऊ ॥
वचन हमारा सत जो होई । जो मांगो सो देऊं तोई ॥

कूर्म उवाच

साखी-ना कछु भोजन चाहैं, ना कछु करूं अहार ।
चन्द्र सूर्य जब पाउं, तब लेऊं शिर भार ॥

पुरुष उवाच चौपाई

चांद सूर्य मैं देहू तोही । कैसे चलै सृष्टि पुनि सोही ॥
जो जगमें होय अंधियारा । कैसे चलै सृष्टि व्यवहारा ॥

कर्म उवाच

साखी-चांद सूर्य चलि आवही, तो मैं करूं अहार ।
चांद सूर्य पहुंचे नहीं, निगुलूं सब संसार ॥

पुरुष उवाच-चौपाई

पुरुष वचन तब कहैं बिचारी । भोजन सूर पहरलेहु चारी ॥
शशि भोजनका भाषू लेखा । घडी घडीको करूं विवेका ॥
अमी चन्द्रके पेट रहाई । ताको लेखा कहुं समझाई ॥
अमृत क्षणक्षण तुम लेहो । पाछै सम्पूर्ण करि देहो ॥
चन्द्रतेज धर्मनि इमि हानी । सूर्यतेज जो बहुत बखानी ॥
कूर्म पुरुष वचन हियो देखा । घडी पहरको बांधे लेखा ॥
पल क्षण दंड परमाना । घडी पहरकी कहूँ ठिकाना ॥
षट स्वासाकी पल यक होई । षट पलकी क्षण जानों सोई ॥
दश क्षणको यक दंड बखाना । दोय दंड यक घड़ी परमाना ॥
चारि घड़ी यक पहर विवेका । चारि पहरका दिन यक लेखा ॥
सात बार दूना करि जाना । यहि विधि पाख भयो परमाना ॥