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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1304

( १६४ )

बोधनागर

अग्नितत्त्वकी सुनियो वानी । दीप अग्निमें जाय समानी ॥
सुषुमनि तत्त्व कहूँ समझाई । दीप अथरमें बैठे जाई ॥

सारखी-सातद्वीप नौ खण्ड हैं इनमें, रहे समाय ।
कहे कवीर धर्मदाससे, निश्चय लोक सिधाय ॥

धर्मदास उवाच

साहब भेद कहो हम जाना । सातबारका कहो ठिकाना ॥
सातबार कैसे उपजाई । चन्द सूर्य कैसे निर्माई ॥
सूरज कैसे तेज समोई । सीतल चन्द कौन विधि होई ॥
निशिवासर कैसे कर जानी । ये सब भेद कहो मोहि ज्ञानी ॥

सतगुरु उवाच

धर्मदास बूझी बल नागर । संत सुकृत ज्ञान उजागर ॥
कहूँ भेद सुनियो चितलाई । चन्द्रसूर दिनवार बताई ॥
पुरुष कमलते सातो वारा । ताको भेद कहूँ टकसारा ॥
सप्तपाखंडी जब बिकसाई । सातबार तहांते आई ॥
आठवाँ बार कमलमें रहेऊ । ताहि बारते सातो कियेऊ ॥
कलीकमल भये औधियारा । निशिवासरको भयो विचारा ॥

सारखी-भंजन कीनो कमलको, छोलन कीनो पास ।
चन्द्रसूर जाते भये कियो पृथ्वी प्रकाश ॥

चौपाई

पहिले छोलन जल' नहि रहेऊ । ताते सूर तेज जो भयऊ ॥
सुनियो चन्द्रकेरि शीतलताई । धर्मदास मैं देउँ बताई ॥
सीच्यो अभी छोल पुनि जबही । शीतल चन्दा उपजे तबही ॥
छोलन चूनि झरि झरि परही । नक्षत्र चंद्रमा संगति करही ॥
यहि विधि चन्द्रसूर जो भयेऊ । धर्मदास हम तुमसे कहेऊ ॥
यह सब रचना कूर्मको दीना । पाछे ध्यान अथरमें कीन्हा ॥